अकादमिक प्रतिष्ठा की रक्षा के उपाय

आतंकी संगठनों के बदले हुए एजेंडे, पडौसी देशों के बीच शीत युद्ध और आतंकी गुटों के भरती अभियानों को मनवांछित समर्थन ना मिलने के कारण उन्होंने अब अकादमिक संस्थानों को सीधे निशाना बनाना शुरू कर दिया है ।  पुराने समय से ही सियासी साजिशों को युवा शक्ति बहुत भाती है। सत्ताधारियों में ये होड़ चली आयी है किसके पास अधिक गुंडे, दबंग और युवा शक्ति होगी। युवाओं और छात्रों में अनुभव नहीं होता। एकता जबरदस्त होती है। वे मित्रों का अनुसरण करते हैं । एक को बहकालो तो उसके मित्रों की नेटवर्किंग से सबको उकसाना,  बरगलाना आसान है । वे बिना सवाल पूछे अनुकरण किया करते हैं । जल्दी ही मानवता के इतिहास का सबसे खतरनाक दौर शुरू हो सकता है, जिसमें हथियारों को थामने वाले हाथ भी आपके बच्चों के होंगे और उनका निशाना भी वे खुद ही होंगे ।

Pakistan_Peshawar__3140840kघर फूंक तमाशा : बीस जनवरी 2016 की सुबह नौ बजे खैबर पख्तूनवा स्थित पाकिस्तान की बाचा खान यूनिवर्सिटी पर सशस्त्र आतंकियों ने हमला करके बीस छात्रों को मार डाला था। इसका पाकिस्तान ने राष्ट्रीय स्तर पर शोक भी मनाया। इससे पहले पेशावर में स्कूली बच्चों पर आतंकियों ने हमला करके सैकड़ों बच्चों को मार डाला था । दुखद तथ्य ये है कि इन घटनाओं के बाद से आतंकी गुटों को रसद, आर्थिक सहायता, सेना की मदद और मार्गदर्शन में तेज़ी आयी है । भारतीय सीमान्त पर स्थित आतंकियों के भरती तथा प्रशिक्षण अभियानों को जैसे नया जीवन ही मिल गया है ।  डरे हुए छात्रों को काबू में लेना इतना फायदेमंद हो सकता है, आतंकियों ने सोचा तक नहीं होगा ।jnu-protests_650x400_71455281490

फरवरी के महीने के आरम्भ में भारत की सबसे चर्चित शिक्षा संस्थाओं में से एक जवाहर लाल विश्वविद्यालय में काश्मीरी आतंकियों को समर्थन देनेवाले एक गुट ने सांस्कृतिक संध्या के नाम पर आतंकियों को महिमामंडित करने का काण्ड रच डाला जो आज देश के सभी विश्विद्यालयों का नासूर बन गया है । विभिन्न शहरों और  शिक्षा संस्थाओं में मौजूद पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के स्लीपिंग मोड्यूल्स अब बदले हालातों का फायदा l इन हालात पर काबू पाने की कोई सुनियोजित नीति या योजना अभी तक सतह पर मौजूद नज़र नहीं आती l प्रतिपक्ष की सियासत स्वाभाविक तौर पर इस माहौल में घी डालने का काम करके अकादमिक संस्थानों को काबू में लेने की विघटनकारी योजनाओं को बढ़ावा ही दे रही है l

तालिबानी फार्मूला : पुराने ज़माने की वैचारिक और आज की विस्फोटक सियासत दोनों का सस्ता, सुलभ और टिकाऊ ईंधन ईंधन युवा सोच- युवा जोश ही सबका निशाना और मकसद है । सत्ता पाने-पलटने और कब्जाने का आजमाया हुआ तालिबानी फार्मूला है : छात्रों को फुसलाओ, हथियार थमाओ और सत्ता कब्जाओ । पहले इसी तरीके से अमरीकी खुफिया एजंसी सीआईए दुनिया भर में अस्थिरता फैलाती थी । कई दशकों तक अमरीकियों की छत्रछाया में रही पाकिस्तानी खुफिया एजंसी आजकल वही पैंतरे आजमा रही है ।

बदली रणनीति : भारत पाकिस्तान के आपसी सम्बन्ध तमाम कोशिशों के बावजूद परवान नहीं चढ़ रहे। पाकिस्तान की सियासत पर सेना का कब्ज़ा बढ़ता जा रहा है। सेना भारत से सीधे युद्ध लड़ने का अंजाम भुगत चुकी है । पाकिस्तान की सियासत में आतंकी गुटों का भी दबदबा बढ़ता जा रहा है । जिन भस्मासुरों को कभी पाकिस्तान ने पाला था, अब उनसे वह पिंड नहीं छुडा पा रहा ।

आतंकी खतरा : इस्लामी लड़ाकों के पास मुस्लिम देशों में काम नहीं बचा है । वे वहाँ से भागने पर मजबूर हैं । जम्मू काश्मीर पर उनका दबदबा कायम तभी हो सकता है, जब भारत की पहले से ही बदनाम और निकम्मी कहलानेवाली पुलिस और आबादी के अनुपात में बेहद अपर्याप्त परा सैनिक बल जगह जगह विध्वंसक गतिविधियों पर काबू पाने में में विफल हो जाएँ और सेना को मजबूरन अशांत इलाकों में लगाया जाए । सेना की तादाद और तैनाती की ताकत सीमाओं पर कम होते ही भाड़े के सैनिकों के ज़रिये पाकिस्तान सीमावर्ती इलाकों पर कब्ज़ा ज़माने की कोशिश करना चाहेगा । युसूफ सुरंग में

साजिशों का चस्का : अफगानिस्तान में सोवियत रूस को नाकाम करने के आपरेशन के मुखिया आईएसआई के ब्रिगेडियर मुहम्मद युसफ ने आईएसआई  को यह सिद्धांत दिया था कि भाड़े के फौजियों से अधिक कारगर युवाओं का इस्तेमाल है । उन्होंने 1992 में प्रकाशित अपनी बेस्ट सेलिंग पुस्तक (लिंक क्लिक करें‘अफगानिस्तान बीयर ट्रेप : सुपरपावर की शिकस्त‘  में भी अफगानिस्तान में इस प्रयोग का विस्तृत खुलासा किया  था । ब्रिगेडियर युसूफ अक्सर कहा करते थे, ” दुश्मन पर सीधा हमला जब नामुमकिन हो तो उसके  खेमे पर पेशाब कर आना चाहिए । इससे दो काम होंगे, हमला करके बच निकलने की काबलियत पनपेगी और दुश्मन अपने ही खेमे की सडांध से पगला जाएगा ।’  हकीकत ये है कि आईएसआई को तब से आज तक ये लगता है कि अफगानिस्तान के प्रयोग को वह भारत में दोहरा सकता है। पाकिस्तान कितना सच है ये तो आनेवाला समय ही बताएगा मगर व्यक्तिगत रूप में मुझे ये परिकल्पना इस लिए हवाई लगती है क्योंकि भारत में कोई विदेशी और विधर्मी सेना मौजूद नहीं है। भारत में मुजाहीदीन, तालिबान, आईएस और सिमी का कोई वजूद कम से कम अभी तक नहीं है । हिन्दुस्तान के मुसलमान भले ही विभिन्न कारणों से भारतीय जनता पार्टी विरोधी मानसिकता रखते हों मगर देश से मुहब्बत करते हैं । सेना में सभी धर्मों के लोग हैं ।

कैंपस सुरक्षा : भारत में बहुमत से सत्ता पा चुकी भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ फिजा बनाने, विघटनकारी गतिविधियों में हिन्दुस्तानी युवा शक्ति का ईंधन हासिल करने और अपने स्लीपिंग मोड्यूल्स का आसान तरीका सिर्फ एक ही बचा है अब नयी सत्ता विरोधी देशव्यापी सशस्त्र आन्दोलनों को बढ़ावा देना । वे सत्ता पर इस्लाम के नाम पर कब्ज़ा नहीं कर सकते तो उन्होंने छात्र एकता को इस्तेमाल करना शुरू किया है । दुखद बात ये है कि देश में अकादमिक संस्थानों के कैम्पस की आंतरिक सुरक्षा के लिए कोई प्रभावी नीति या कार्ययोजना नहीं है । छात्रों को आसन्न संकट की जानकारी नहीं है और वोट बैंक की सियासत में उलझी राज्य सरकारें भी इस खतरे से निपटने पर ध्यान नहीं दे रहीं ।

साख की सुरक्षा : हाल ही में जेएनयू परिसर में आठ फरवरी से नौ फरवरी के बीच हुई तीन अलग अलग घटनाओं को किसी शातिर तत्व ने टेलिविज़न चैनलों को सप्लाई कर दिया और टीआरपी बढाने की होड़ में उनका प्रसारण कुछ विवादास्पद ढंग से कर दिया गया। नतीजे के तौर पर मीडिया के सभी स्तरों और सोशल मीडिया में छोटी से छोटी घटनाओं को लेकर देश भर का माहौल गरमाने का कारोबार चालू हो गया। अभी तक देश के पांच विश्विद्यालयों और सात अकादमिक संस्थानों की साख पर ऐसी हरकतों से बट्टा लगा है ।FuturePRWars

कैंपस आतंकवाद : डार्क पीआर (प्रोपेगंडा) विशेषज्ञ डैग्मर किंग मौजूदा ऑनलाइन विश्व के भावी खतरों में सबसे बड़ी चुनौती कैंपस आतंकवाद से निबटने को मानते हैं।  उनका कथन है कि अनेक वर्षों में निहित स्वार्थी तत्वों की गतिविधियों से अधिक अकादमिक संस्थानों को खुद ये ध्यान रखना होगा कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति ना हो और इसे रोकने के लिए अभी से उपाय करने होंगे । सरकारें अपने स्तर पर चौकसी बरतें और संस्थान अपने स्तर पर । संस्थान के मार्केटिंग और जनसंपर्क विभागों को इस बारे में नयी पहल करनी होगी क्यों यदि किसी अकादमिक संस्थान की साख प्रभावित होगी तो उसका कारोबार, प्रवेश संख्या, अकादमिक ख्याति तथा मान्यता पर संकट आना तय है ।

पुराने सबक : अभी तक पूरे संसार में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कुछ साल पहले तक पुराने किस्म के जनसंपर्क का बोलबाला था । लेकिन प्रोपगंडा या जनसंपर्क से ना तो किसी कॉलेज को कामयाबी मिलती दिखी और ना ही यूनिवर्सिटी को ।  यह माना जाता है कि यदि विशिष्ट जनसंपर्क तकनीकों का लगातार सदुपयोग ना हो तो किसी मजबूत से मजबूत अकादमिक ब्रांड की प्रतिष्ठा कभी ना कभी धूल में मिल ही जायेगी । इसके उलट यदि नए ब्रांड असरदार तरीके से मार्केटिंग और जनसंपर्क तकनीकों का इस्तेमाल करें तो उनको फायदा मिलना तय है । लेकिन जब खुले बाज़ार की वैश्विक व्यवस्था के आगमन के बाद यह धारणा नाकाम होती दिखी तो प्रबंधन रणनीतिकारों ने इस और ध्यान देना शुरू किया कि आखिर क्यों ऐसा हो रहा है ? पता चला कि ऐसा किसी प्रतिस्पर्धा के कारण नहीं हुआ था अलबत्ता उच्च शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े अध्यापकों, छात्रों तथा कारपोरेट जगत ने ही आपने भिन्न उद्देश्यों हेतु अकादमिक संस्थानों के चयन के समय उनकी प्रतिष्ठा का मूल्यांकन करना शुरू कर दिया था । नतीजा यह हुआ कि मीडिया में श्रेष्ठ अकादमिक, प्रबंधन तथा अन्य प्रकार के संस्थानों के व्यापक वर्गीकरण पर आधारित कवर स्टोरीज़ छापनी शुरू कर दीं और लोगों ने उनके आधार पर संस्थानों को अपनाना या खारिज करना शुरू करना दिया ।

नयी सोच : आतंकवाद का ख़तरा तो नया है मगर अकादमिक संस्थानों में स्कैंडलों, घोटालों तथा अनुशासनहीनता से भी उनके वजूद पर भी असर पड़ता है । इस से सबक लेकर हाल ही के वर्षों में अनेक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों ने अपने मानव संसाधन, जनसंपर्क, मार्केटिंग और कार्मिक विभागों को इस नज़रिए से अधिक प्रभावी बनाना शुरू किया कि हरेक इकाई के अध्यक्ष निकटता से काम करते हुए संस्थान की छवि चमकाएं, ना कि अपनी खुद की नाक ! नए ज़माने की सोच का ही नतीजा है कि बाज़ार में किसी भी क्षेत्र में कामयाब संस्थान अपनी महारत को भुनाने में आज पहले से ज़्यादा तेज़ी से संस्थागत बदलाव में जुटा हुआ है । लगता है कुछ ही सालों में यह परिदृश्य किसी भी संस्थान में एकछत्र राज करनेवाले दबंगों के बजाय नतीजे देने में सक्षम लोगों से भरा होगा । ऐसी घटनाओं को दोहराना नामुमकिन होगा ।

Jim and Lauri Grunigनए गंठजोड़ और समीकरण : उपभोक्ता पर आश्रित बाजार के उदय के साथ ही ने नज़ारा इतनी जादुई गति से बदला है कि आज छात्रों, शिक्षकों, कर्मचारियों, निवेशकों, दान-दाताओं, समुदायों और समाज को हर योजना के केंद्र में रख कर अकादमिक संस्थान आगे कदम बढ़ा रहे हैं । विश्वविद्यालयों और संस्थानों ने अपनी योजनाओं में सत्ता समीकरणों, रैंकिंग, छात्रों के बेहतर प्लेसमेंट (रोज़गार), छात्र-शिक्षक-कार्मिक समस्याओं के समाधान, मीडिया, दान और निवेश को ध्यान में रखकर नए तरीके की कार्य योजनाओं पर बल देना शुरू किया है । ये देखना अपने आप में बहुत मजेदार अनुभव है कि नए गंठजोड़ और समीकरण अकादमिक संस्थानों के उन्नति और कामयाबी को किस तरह से प्रभावित कर रहे हैं ! नए अकादमिक संस्थान अपने परिसर में रैगिंग, छात्रों को डराने धमकाने, शोषण तथा उनको राजनीतिक आन्दोलनों में इस्तेमाल करने के खिलाफ क़ानूनी प्रावधान भी करने लगे हैं ।  आतंकवाद के प्रसार के लिए जो उपाय किये जा सकते हैं उस में संस्थानों को राज्य सरकारों तथा केंद्र पर दबाव बनाना चाहिए ।

दक्षता सिद्धांत : 2002 में दक्षता सिद्धांत पेश करनेवालीं ग्रनिंग और उनके साथियों ने जनसंचार का मनोवांछित सार्वजनिक प्रभाव छोड़नेवाले अनेक तत्वों की पहचान करते हुए अपने शोध में कहा था कि केवल जनसंपर्क विभाग को मजबूत करने या ज़्यादा विज्ञापन देने से जनमत को प्रभावित करना संभव नहीं है । कैंपस का अनुशासन, दक्षता स्तर, अकादमिक कलेंडर कायम रखने के साथ ही बेहतर परिणामों के लिए अकादमिक संस्थानों पर प्रोफ़ेसर डॉ. लॉरी ग्रनिंग तथा उनके पति जिम ग्रनिंग के दक्षता सिद्धांत को चार भागों में लागू किया जा सकता है :

  1. छोटी इकाइयों का गठन : संस्थान के सभी विभागों में अकादमिक गतिविधियों तथा अनुशासन को बढ़ावा देने हेतु उस विभाग की विशिष्ट छोटी जनसंपर्क इकाई का गठन  । यह मुख्य जनसंपर्क कार्यालय के साथ समन्वय करेगी ।
  2. बेहतर समन्वय : संस्थान के सभी विभागों के बीच अनिवार्यतः आपसी संवाद, समन्वय तथा सहयोग को बढ़ावा देना। इससे संस्थान के हर अनुभाग की सभी गतिविधियों की संस्थान के हर स्तर को खबर रहेगी और ज़रूरी होने पर परिस्थिति को अविलम्ब काबू किया जा सकेगा ।
  3. मानव संसाधन विकास :  अकादमिक संस्थान के अपने सहयोगियों को अधिक अधिकार संपन्न देकर उनको प्रभावी, अधिकारसंपन्न तथा अधिक सामर्थ्यवान बनाना । इससे उनके निर्णय तथा परिस्थितियों का आकलन करने की क्षमता बढ़ेगी ।
  4. सामुदायिक सहयोग : समाज के विभिन्न वर्गों और स्तंभों से संपर्क रखने से संस्थान की छवि या वातावरण को खराब करना नामुमकिन होगा । अभिभावकों और शिक्षकों की वांछित व्यक्तियों तक सीधी पहुँच दोधारी तलवार का काम करेगी । छात्रों की समय से मदद होगी, परिवारों का संस्थान से जुड़ाव बढेगा और अकादमिक संस्थान की प्रत्येक रचनात्मक गतिविधि को हर प्रकार के सामाजिक माध्यम से बढ़ावा मिलेगा  ।

बदलती भूमिकाएं : अब वो युग ख़त्म हो गया है जब प्रेस नोट जारी करना की जनसंपर्क कहलाता था ।विभिन्न विभागों में जनसंपर्क गतिविधियों को बढ़ावा देने से अधिक समाचारों और सूचनाओं का बाहर को प्रवाह आरम्भ होने से एक तरफ तो लोगों में अच्छा सन्देश जाएगा दूसरी और कोई भी गतिविधि बेकाबू हो ही नहीं पायेगी । संस्थान भी किसी मामले में मनमानी नहीं कर पायेगे । अब मुख्य जनसंपर्क कार्यालय का कार्य मीडिया प्रबंधन तक सिमट जाने से जनसंपर्क के लोगों का मानव संसाधन, मार्केटिंग तथा अकादमिक प्रचार में अधिक किया जा सकता है । मीडिया को कोई जानकारी चाहिए होगी तो वह किसी बहकावे में नहीं आयेगा । आस्ट्रेलिया और अमरीका में यही हो रहा है । दूसरी और छात्रों तथा शिक्षकों को अपनी प्रतिभाओं को निखारने का मौक़ा मिलने के साथ ही संस्थान के लिए विभिन्न विभागों की ज़रूरतें भी पूरी करना आसान हो जाता है । मानव संसाधन विभाग, मार्केटिंग, कार्मिक और जनसंपर्क विभाग के बीच निकट समन्वय संस्थान की ख्याति तथा छवि निखारने में भी मदद करता है । इस बदले वातावरण से बहुत से अन्य बुनियादी बदलाव भी मुमकिन हो जाते हैं तथा किसी भी संस्थान के छात्रों के आत्म विशवास में बेशुमार बढ़ोतरी नज़र आती है । ऐसे में संस्थान में आतंकी गतिविधियाँ पनपने या उनका नाम ख़राब होना एकदम नामुमकिन हो जाएगा ।

मदद के रिश्ते : नए तरीके से कामकाज में जब कई तरह के विशेषज्ञ छात्रों तथा शिक्षकों के साथ काम करते हैं तो वे एक दूसरे पर हावी होने या खुद को बेहतर साबित करने के बजाय टीम भावना का अनुसरण करने पर बाध्य हो जाते हैं । टीम में एक से अधिक श्रेष्ठ लोगों के उदय से दूसरों को बेहतर बनने की प्रेरणा मिलती है । इसका अकादमिक माहौल पर असर पड़े बिना नहीं रहता । छात्र असंतोष और समस्याओं के पनपने के अवसर भी कम से कम होते जाते हैं । सहयोगी भूमिकाओं के पनपने के साथ ही लोगों की सोच लीक से हट कर बेहतर कर दिखाने की होती जाती है जिसका सीधा असर संस्थान के नतीजों पर पड़ता है । अंततः संस्थान की कार्यप्रणाली के साथ उसकी छवि निरंतर निखरती जाती है । इस कार्यप्रणाली से एक वर्ष में किसी नए संस्थान की ख्याति का किसी स्थापित अकादमिक संस्थान की ख्याति के बराबर पहुंचना तक मुमकिन है । Academic BrandPR

प्लेसमेंट विभाग : महंगाई और बेरोजगारी बढ़ने के साथ ही दुनिया भर के अकादमिक संस्थानों में मानव संसाधन विभाग का महत्त्व बहुत अधिक बढ़ा है ।  नए ज़माने में अकादमिक संस्थानों में अब नये छात्रों को आकर्षित करने का काम अकेले प्रचार तंत्र का नहीं माना जाता । इसी प्रकार छात्रों के प्लेसमेंट की सिरदर्दी केवल मानव संसाधन विभाग का बोझा नहीं रहा है । नयी सोच में सब कार्य सभी के माने जाते हैं।  सभी विभाग मिलकर हर प्रकार के नतीजे हासिल करते हैं । अंतर बस इतना आया है कि छवि निर्माण की योजनाओं को बनाना, अमल में लाना और नतीजे हासिल करना जनसंपर्क तथा मार्केटिंग के जिम्मे होते हुए भी अन्य अन्तर्विभागीय सलाहकारों का सीमित उत्तरदायित्व है वहीं प्लेसमेंट में सभी विभागों का कुछ ना कुछ योगदान तथा भूमिका रहती है क्योंकि किसी संस्थान की छवि-प्लेसमेंट और ख्यति से ही उसे निवेश तथा मदद मिलती है ।

कामयाबी सबकी : आमतौर पर अब तक दुनिया भर में सभी प्रकार की अकादमिक जनसंपर्क इकाईयों की भूमिका सामान्य मीडिया संपर्क, प्रचार, विज्ञापन और पत्रकारों के आतिथ्य तक सीमित मानी जाती थीं । अब इस परिदृश्य में इंकलाबी बदलाव और उसके हैरत अंगेज़ परिणाम दिख रहे हैं । जनसंचार तथा जनसंपर्क के पाठ्यक्रम चलनेवाले संस्थाओं ने तो इसमें अति उत्साही छात्रों को भी इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है । इससमें छात्र भी बढ़ चढ़ कर भूमिका निभाते है तथा बदले में डिग्री के साथ विश्वविद्यालयों-संस्थानों से अनुभव का दो-तीन वर्षीय प्रमाण पत्र भी हासिल करते हैं । ये प्रमाण पत्र उनके भावी कैरियर में बहुत काम आते हैं । पुराने सड़े गले जनसंपर्क के तौर तरीकों से कम से कम अकादमिक संस्थानों की दुनिया ने निजात पाने का रास्ता खोज निकाला है । जल्दी ही देशद्रोही गतिविधियों की तो क्या कहें, अकादमिक संस्थानों में प्रचार तथा जनसंपर्क मद तक में घोटालों की खबरें भी सुनायी पढ़ना बंद हो जायेंगीं ।

कापीराईट © 2016 डॉ. अशोक कुमार शर्मा । सर्वाधिकार सुरक्षित ।

About Ashok Kumar Sharma

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