मीडिया संपर्क में सावधानियां

मीडिया सम्पर्क की दुनिया में भी अस्तित्व की रक्षा का सिद्धान्त लागू होता है। हर संस्थान में केवल वही मीडियाकर्मी सम्मान पाता है, जो खबरों के मामले में अन्य मीडियाकर्मियों से आगे रहता है। मीडिया सम्पर्क का सबसे बुनियादी सूत्र है कि मीडिया कर्मियों को प्रतिदिन नई खबरें, नई जानकारियाँ और अनोखे तथ्य हर स्थिति में चाहिए। मैंने 40 साल तक देश के प्रमुख राजनेताओं का मीडिया और जनसम्पर्क का कार्य देखा है और मुझे इस बात का एहसास है कि पेड मीडिया के बढ़ते दबदबे के बावजूद आज भी मीडिया में अच्छे लोगों की भरमार है। यदि आप उन्हें यह विश्वास दिला सकें कि आप उनके संस्थान या उनका दुरुपयोग नहीं करना चाहते, तो वे आपकी पूरी मदद करेंगे। यह बात और कि यदि आपके पास विज्ञापन का भरपूर बजट है तब भी मीडिया बहुत खुशी से आपकी मदद करेगा। सच है कि विज्ञापन पर ही मीडिया संस्थानों का जीवन चलता है, मगर उनका अस्तित्व सच्चाई के लिए लड़ने से है। मीडिया संस्थान अपराधियों और झूठों का साथ बहुत अधिक समय तक नहीं दे सकते।
बिकाऊ और फर्जी खबरों के युग में भी मीडिया सम्पर्कों का उतना ही महत्व है, जितना पहले कभी हुआ करता था। आज मीडिया की विश्वसनीयता इतिहास के सबसे न्यूनतम स्तर पर है। यह माना जाता है कि ऐसा संसार के हर एक देश में हो रहा है। मंहगाई के इस दौर में टिके रहने के लिए मीडिया संस्थान भी तरह-तरह के हथकंडे अपनाने पर विवश हो गये हैं। इसके बावजूद मीडिया में निजी सम्पर्कों का महत्व जस का तस बरकरार है। मीडियाकर्मी आज भी अपने समाचार-स्रोत की रक्षा के लिए जान की बाजी लगा दिया करते हैं। राजनेताओं और प्रसिद्ध व्यक्तियों द्वारा जानबूझकर मीडिया को अविश्वसनीय ठहराने के जो प्रयास किये जाते रहे हैं, उनका प्रभाव मीडिया की विश्वसनीयता पर बेशक पड़ा है।
जनसम्पर्क विशेषज्ञों के लिए आज मीडिया में पैठ बनाना एक चिन्ता का विषय है। बहुत से जनसम्पर्क विशेषज्ञ इस कल्पना से ही सिहर जाते हैं कि उन्हें किसी मीडिया संस्थान में लोगों से कोई काम कराना है। उन्हें मालूम ही नहीं होता कि किसी संस्थान में मीडियाकर्मियों से काम निकालने के लिए क्या करना चाहिए? बहुत से जनसम्पर्क विशेषज्ञ अपने यजमान से मीडिया को धन देने के नाम पर अतिरिक्त शुल्क भी वसूलते हैं। वास्तविकता यह है कि बिकाऊ खबरों के दौर में भी अच्छे मीडियाकर्मी ज़िन्दा हैं, ठीक उसी तरह जिस प्रकार समाज में अपराधियों और असमाजिक तत्वों के बावजूद अच्छे नागरिक मौजूद हैं। मीडिया में अच्छाई और बुराई के सन्तुलन को अपने पक्ष में इस्तेमाल करना ही सफल मीडिया सम्पर्क का गुण है।
किसी भी उद्देश्य से किये जा रहे मीडिया सम्पर्क में यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिए कि आप अत्यन्त प्रतिभाशाली और ऐसे सतर्क लोगों से मिल रहे हैं, जो आप जैसे लोगों से हर रोज मिलते हैं। यदि आप एक बार मीडिया सम्पर्क के स्वार्थों को भूलकर अच्छे मीडियाकर्मियों की निकटता हासिल करने का प्रयास करेंगे, तो आपको कभी निराशा नहीं होगी। अपनी हैसियत, कैरियर और सम्मान तक को दांव पर लगाकर लोगों के लिए जान पर खेल जाने वाले लोग मीडिया में कम नहीं हैं। यह बात अलग है कि आप मीडियाकर्मियों को एक बार से अधिक से धोखा नहीं दे सकते। इसलिए मीडिया सम्पर्क में प्राकृतिक रूप से और बिना हड़बड़ी के रिश्तों का विकास करने का प्रयास करना चाहिए।
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में जब मुझे मुख्यमंत्रियों का मीडिया और जनसम्पर्क देखने का पहली बार अवसर मिला तब मैने तीन दिन का समय केवल विभिन्न कार्यालयों में जाकर राजनीतिक संवाददाताओं से मिलने का समय निकाला। अपने कार्यालय से मैं यह सुनिश्चित कर लेता था कि किस समय किस कार्यालय में कौन-सा राजनीतिक संवाददाता उपलब्ध था। यकीन मानिए उनमें से हर एक मुख्यमंत्री और राज्यपाल को व्यक्तिगत रूप से जानने वाला था। उनमें से अधिकांश सत्ता के सबसे बड़े अधिकारियों के निकट मित्र थे। उन्हें अपनी शक्ति का पूरा एहसास था। यही नहीं, उनमें से कई इतने शक्तिवान थे कि उनके एक संकेत पर मुझे सचिवालय से हटाया जा सकता था। इसके बावजूद जब मैं उनसे मिलने गया तब आरम्भिक संकोच और दूरियों के बावजूद उन लोगों ने मुझे पूरा महत्व दिया और सहयोग का आश्वासन भी। इसी कारण मैं उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री के सचिवालय में सूचना विभाग के इतिहास में सर्वाधिक समय तक कार्य करने वाला मीडिया प्रमुख रहा।
उपरोक्त उदाहरण मैने इसलिए दिया है, ताकि मीडिया सम्पर्क की दुनिया में आने वाले नये लोग यह जान सकें कि वे जिस भी मीडिया कार्यालय में जिस भी कार्य से जायेंगे, उनकी मुलाकात ऐसे लोगों से होगी, जिनके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सम्पर्क आपसे हर मायने में बेहतर होंगे। ये लोग अगर आपको एक बार समझना शुरु कर दें, तो किसी कीमत पर आपको ठुकरायेंगे नहीं। मै इस बात को इसलिए भी याद रखता हूँ, क्योंकि जब तीसरी बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी मायावती ने मुझे किसी गलतफहमी के कारण हटाया तो उसके कुछ ही समय बाद मुझे उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री कार्यालय में विशेष कार्याधिकारी के रूप में तीन वेतन मान अधिक देकर नियुक्त कर दिया गया। जबकि मैं उत्तराखण्ड की राजनीति में किसी को नहीं जानता था। बहुत बाद में मुझे पता चला कि तत्कालीन मुख्यमंत्री डाॅ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ को लखनऊ के कुछ पत्रकारों ने फोन करके मेरे बारे में प्रशंसा की थी। डाॅ. निशंक के हटने पर उनके प्रतिद्वंद्वी जनरल खंडूरी ने भी पत्रकारों की राय पर मुझे अपने साथ बनाये रखा और दिल्ली का भी अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया। जनरल खंडूरी के हटने पर उनके स्थान पर मुख्यमंत्री बने कांग्रेस के नेता विजय बहुगुणा ने भी पत्रकारों के परामर्श पर मुझे दिल्ली के कार्य से हटाकर देहरादून से सम्बद्ध रखा और मेरे लिखित आग्रह पर भी बहुत कठिनाई से मुझे उत्तर प्रदेश के लिए कार्यमुक्त किया।
मीडिया से सम्बन्ध बनाना कोई आसान कार्य भी नहीं है। ऐसा तो हरगिज़ नहीं होता कि आप पहली बार किसी मीडिया कार्यालय में चले जायें और वहां आपका कोई मित्र बन जाये। हमेशा याद रखिएगा कि प्रभावशाली और महत्वपूर्ण मीडियाकर्मियों से मुलाकात करने के लिए आपका विज़िटिंग कार्ड ही काफी नहीं होगा। सम्भव है आपको एक-दो बार उनसे मिलने का प्रयास करना पड़े। अधिकांश व्यस्त पत्रकार सुबह 11 बजे के आस-पास अपने कार्यालय में दैनिक बैठक के लिए आते हैं। उनसे मिलने के लिए यह समय हरगिज़ सही नहीं है। वे दिनभर के कार्यक्रमों के लिए दौड़़-भाग में लगने वाले होते हैं। ऐसे में किसी से बात करना उनकी प्राथमिकता नहीं होती। उचित होगा कि आप दैनिक बैठक के बाद उस कार्यालय में उपलब्ध ब्यूरो प्रमुख अथवा समाचार सम्पादक से भेंट करें। अपनी प्रथम भेंट वार्ता में आप क्या कहेंगे, इस पर आपके भावी सम्बन्ध निर्भर करेंगे।
किसी भी मीडिया घराने के प्रमुखों का एक कार्य होता है, अपने प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले बेहतर कवरेज को बढ़ावा देना। यदि आप इसकी तैयारी करके जायेंगे और उन्हें बताएंगे कि हाल ही में उनके संस्थान के कौन से कार्यक्रम आपको अधिक प्रभावशाली लगे और किन कार्यक्रमों में आपको व्यक्तिगत तौर पर कुछ कमी नज़र आयी, तो आपको पहली ही बार में भरपूर महत्व मिलेगा। लेकिन यह तरीका सम्बन्धित मीडियाकर्मी से मिलते समय काम नहीं आयेगा। उनसे मिलते समय आपको यह ध्यान होना चाहिए कि हाल ही में उनके द्वारा किन कवरेज में कमाल किया गया है। आप उनकी प्रस्तुति और उस कार्यक्रम में इस्तेमाल खास जुमलांे की सराहना कर सकते हैं। इसके बाद आप स्वाभाविक तौर पर उनके काफी नज़दीक आ जायेंगे। पहली मुलाकात के बाद दूसरी मुलाकात की शीघ्रता न करें। उचित होगा कि आप उस मीडियाकर्मी को व्हाट्सएप, ई-मेल और एसएमएस के उपयोग से यदा-कदा उनकी स्टोरीज़ पर प्रतिक्रियाएं भेजते रहें। सुबह-शाम गुडमाॅर्निंग और गुड ईवनिंग के सन्देश हरगिज़ मत भेजिएगा। यदि पहली ही मुलाकात में किसी तरह से आप उस मीडियाकर्मी का ई-मेल और सोशल मीडिया एकाउंट जानने में सफल हो जाते हैं, तो इससे बेहतर कुछ नहीं है। आप उसी दिन उस मीडियाकर्मी को सोशल मीडिया पर फाॅलो करना शुरु कर दीजिए। उसकी महत्वपूर्ण पोस्ट पर लाइक्स और टिप्पणियाँ भी कीजिए। यह टिप्पणियाँ केवल इमोटीकाॅन नहीं होनी चाहिए। मीडियाकर्मियों से निकट सम्बन्ध बनाने के लिए उनकी पोस्ट पर एक शब्द लिखना कभी भी अच्छे नतीजे नहीं देगा। आपको उस पोस्ट को पूरा पढ़कर कम से कम तीन चार पंक्तियाँ लिखनी होंगी। धीरे-धीरे आप उस मीडियाकर्मी के अधिक निकट आ सकते हैं। उनसे जब चाहे तब मिल सकते हैं। सोशल मीडिया के उपयोग से आपको यह भी पता चल जायेगा कि उस मीडियाकर्मी का जन्म दिन कब है और विवाह की वर्षगांठ कब है। इससे आप एक कदम आगे बढ़ा सकते हैं। उसे व्यक्तिगत बधाई और उपहार देने का अवसर निकाल सकते हैं। यह उपहार बहुत मंहगा नहीं होना चाहिए।
यदि आप किसी व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए मीडिया का उपयोग करना चाहते हैं, तो आपको निश्चित ही विज्ञापन पर आधारित प्रायोजित मीडिया कवरेज पर निर्भर होना पड़ेगा। मीडिया स्वभावतः किसी व्यवसायिक गतिविधि को बिना अपने संस्थान का लाभ सुनिश्चित किये बढ़ावा नहीं देता। इसके अपवाद केवल वही कार्यक्रम होते हैं, जो आयोजित तो व्यवसायिक उद्देश्यों के लिए किये जाते हैं, परन्तु जिनका स्वरूप सार्वजनिक होता है। ऐसे कार्यक्रमों को मीडिया आमतौर पर नज़र अंदाज़ नहीं करता। अनेक मामलों में तो मीडिया ऐसे कार्यक्रमों को प्रस्तुत करने में साझीदार भी बनने में संकोच नहीं करता। इस प्रकार के सह प्रायोजनों के नियम और शर्तें आयोजक आपस में मिलकर तय कर लेते हैं। सामान्यतः मीडिया इस प्रकार के आयोजनों में साझीदारी का कोई भुगतान नहीं करता, अपितु उसकी एवज में उस आयोजन का निःशुल्क विज्ञापन और कवरेज मीडिया पार्टनर के रूप में कर देता है।
राजनीतिक जनसम्पर्क की दुनिया में मीडिया के साथ समीकरण कुछ अलग ही प्रकार के होते हैं। राजनीतिक जनसम्पर्क दो तरह का हो सकता है। एक तो जब आप सत्ता में हों और आपके पास मीडिया सम्पर्क कार्य के लिए सरकारी मशीनरी तथा विज्ञापन का बजट भी हो। दूसरा तब जब आप चुनाव लड़ रहे हों और आप पर निर्वाचन आयोग द्वारा लागू आचार संहिता की बन्दिशें हों। पहली स्थिति में राजनीतिक जनसम्पर्क का कार्य कुछ आसान होता है, क्योंकि आपके पास मीडिया सम्पर्क से जुड़े कार्य करने वाली मशीनरी होती है। प्रतिभावान लोगों की टीम होती है। जिनका आप उपयोग कर सकते हैं। चुनावों की घोषणा हो जाने के बाद आप सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल खुल कर नहीं कर सकते। देश भर के सत्तारूढ़ दल चुनावों के दौरान कार्यवाही होने से बचने के लिए अपनी पार्टी के स्रोतों का ही इस्तेमाल करते हैं।
यदि आप सत्ता में नहीं हैं, तब आपके पास काम करने की अधिक सुविधा है। राजनीतिक जनसम्पर्क से जुड़े अधिकांश लोग यह मानते हैं कि मीडिया सत्तारूढ़ दल को अधिक महत्व देता है। इसमें कुछ सच्चाई भी है। इसका कारण यह भी है कि तमाम तरह की सरकारी सुविधाओं का प्रचलन होने के कारण मीडिया की सरकारी तन्त्र पर कुछ अधिक निर्भरता होती है। यह निर्भरता मीडिया को अधिक बांध कर नहीं रख पाती। आपने स्वयं ध्यान दिया होगा कि सरकारी तन्त्र की अति सक्रियता के बावजूद रोज ही मीडिया में प्रतिपक्षी राजनेताओं के बयान, भाषण, रैलियाँ, प्रतिक्रियाएँ और आरोप-प्रत्यारोप नज़र आते रहते हैं। इसका बुनियादी कारण यह है कि मीडिया के सभी ग्राहक सत्तारूढ़ दल को ही पसन्द नहीं करते। आर्थिक मज़बूरियों के बावजूद मीडिया को अपने प्रसार और टीआरपी का भी ध्यान रखना होता है। यदि कोई मीडिया आर्थिक लालच में आकर केवल एक तरफा खबरों का प्रसारण-प्रकाशन करेगा, तो अपनी साख खो देगा। लोग उसे छोड़कर किसी दूसरे समाचार माध्यम को अपना लेगें। यही सन्तुलन लोकतन्त्र का सौंदर्य है।
जनसम्पर्क के पेशे में अपने यजमान को समाचारों में महत्व दिलाना बहुत ज़रूरी माना जाता है। मीडिया संस्थानों में प्रतिदिन विज्ञापनों के दबाव और समाचारों की भरमार के कारण यह कार्य अनायास नहीं हो सकता। आपको अपना समाचार ही इस प्रकार से तैयार करना पड़ेगा कि वह समाचार सम्पादक की जानकारी मेें ज़रूर आये। उस समाचार का प्रकाशन सम्भव है कि एक बार न हो, दूसरी बार उसी समाचार को नये सिरे से बनाकर भेजने पर भी यदि महत्व न मिले, तो समझ लीजिए आपके उस संस्थान में सम्पर्क बन नहीं पाये हैं। इस स्थिति से निपटने का एक ही उपाय है कि उस समाचार को सोशल मीडिया के सभी प्लेटफाॅर्म पर पोस्ट किया जाये। यदि आपके समाचार में दम है, तो एक ही दिन में वह हजारों लोगों तक पहुँच जायेगा। मीडिया भी उसे महत्व देगा। अन्यथा आप अगले मौके की प्रतीक्षा और अपने समाचार लेखन की कला में सुधार कीजिए।
यह कभी नहीं भूलिएगा कि मीडियाकर्मियों की सत्तारूढ़ दल से निकटता उनकी पहचान नहीं होती। मीडियाकर्मियों को उनकी चैंकानेवाली, अनोखी और सनसनीखेज खबरों के लिए समाज में सम्मान मिलता है। मीडियाकर्मी भी हम लोगों की तरह ही सामाजिक प्राणी होते हैं। वे पक्ष पात करके अपने सम्मान को दांव पर नहीं लगा सकते। व्यक्तिगत तौर पर मीडियाकर्मी इतने प्रखर होते हैं कि किसी राजनेता के बारे में प्रतिकूल समाचार प्राप्त होने पर सीधे उसी से प्रतिक्रिया मांगने का साहस रखते हैं। आप इसको उनका पक्षपात मान सकते हैं कि आरोप प्रत्यारोप की कहानी के साथ प्रभावित पक्ष की कहानी को भी वह अपने कवरेज में स्थान देते हैं। पत्रकारिता के मापदण्डों में इसे पक्षपात नहीं अपितु निष्पक्षता कहा जाता है।
राजनीतिक जनसम्पर्क में समाचार माध्यमों में छाये रहने के लिए मीडिया के उपयोग में अनेक सावधानियाँ बरतना आपको सदा मदद देता है। फोटोग्राफर से लेकर कैमरामैन तक और संवाददाता से लेकर सम्पादक तक, आपके लिए सभी सम्मानीय और महत्वपूर्ण होने चाहिएं। आपका उनके साथ व्यवहार, औपचारिक और शिष्ट तो हो, परन्तु किसी भी स्थिति में नकली नहीं होना चाहिए। यह हमेशा याद रखिएगा कि मीडिया में सभी लोग एक जैसे नहीं होते, ठीक उसी तरह जिस प्रकार समाज में सभी एक जैसे नहीं होते। यदि आप मीडिया सम्पर्क प्रोफेशनल हैं, तो आप सभी मीडियाकर्मियों से सम्पर्क बनाने का प्रयास अवश्य करें, परन्तु यह कभी न भूलें कि कुछ मीडियाकर्मियों की प्रकृति मेें मैत्रियाँ निभाने का स्वभाव नहीं होता। ऐसे लोगों की वजह से मीडिया के बारे में कोई व्यक्तिगत धारणा न बनायें और हताश भी न हों। मीडिया सम्पर्क का सबसे आसान सूत्र है, यह ध्यान रखना कि आपके क्षेत्र में सर्वाधिक महत्वपूर्ण मीडिया संस्थान कौन से हैं? उन संस्थानों में कौन लोग आपके क्षेत्र से सम्बन्धित कार्य देखते हैं? उन लोगों से निकट सम्पर्क बनाने में सफलता ही सफल मीडिया सम्पर्क की पहचान है। यह कार्य अलग-अलग किस्म के प्रोफेशनल्स् विभिन्न प्रकार से करते हैं। मीडिया सम्पर्क की दुनिया लिखित सिद्धान्तों पर काम नहीं करती। यह आपके व्यवहार और लोगों को अपना बनाने की कला पर निर्भर करती है। मीडिया के लोगों को आमतौर पर सत्तारूढ़ दल के निकट माना जाता है, जबकि स्थिति इसके उलट ही है। मीडिया को रोज ऐसी खबरें चाहिए, जिन्हें जनता पसन्द करे। जनता उन्हीं खबरों को पसन्द करती है, जो जनहित के मुद्दों से जुड़ी होती है। सत्तारूढ़ दल के पास ऐसी खबरें रोज तो हो नहीं सकती। कोई भी दल कितना भी लोकप्रिय क्यों न हो उससे 40 प्रतिशत लोग हमेशा नाराज़ ही रहते हैं। उस दल के विरोधी दल भी हुआ करते हैं। उनके पास भी बहुत से आरोप और सवाल हुआ करते हैं। मीडिया अच्छी तरह जानता है कि लोकतन्त्र की उठापटक में कब कौन-सा दल सत्ता पा जायेगा, यह तय करना उसके हाथ में नहीं है। जनता को मीडिया अपनी प्राथमिकताओं की लाठी से हांकने की कोशिश तो ज़रूर करता है, परन्तु जन समर्थन की हवा को भांपते ही सबसे पहले पाला बदलने वाला मीडिया ही होता है। इसके बावजूद मीडिया का एक वर्ग अपने आर्थिक हितों की विवशता के बावजूद राजनीतिक प्रतिबद्धता के कारण सदा ही सत्ता के विरुद्ध नज़र आता है। अब यह आपके ऊपर है कि बेहतर मीडिया सम्पर्क के लिए आप कौन-सा रास्ता चुनना पसन्द करेंगे।
बदलते दौर में सोशल मीडिया बहुत तेजी से प्रिंट और इलैक्ट्राॅनिक माध्यमों को हड़पता जा रहा है। अपनी मीडिया सम्पर्क रणनीतियाँ बनाते समय इस तथ्य का ध्यान रखना, आपकी हमेशा सहायता करेगा। यह कभी मत भूलिएगा कि प्रिंट और इलैक्ट्राॅनिक समाचार माध्यमों के भी आॅनलाइन संस्करणों का अस्तित्व भी केवल इसलिए है कि लोग अब इंटरनेट पर अधिक निर्भर हो गये हैं। भविष्य में जब मीडिया सम्पर्क के लिए आप अपने कार्यालय से कदम बाहर निकालें, तब आपका व्यवहार आपकी शक्ति होना चाहिए। आपका विज्ञापन बजट आपका सहयोगी होना चाहिए और आपका कन्टेन्ट आपका आत्मविश्वास बना रहना चाहिए। मीडिया सम्पर्क में पहला शब्द मीडिया है। दूसरा शब्द सम्पर्क है। जाहिर है मीडिया बिना कन्टेन्ट के कुछ भी नहीं है। बिना कन्टेन्ट के मीडिया से सम्पर्क नामुमकिन है।

About Ashok Kumar Sharma

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