Category Archives: Relations Management

भारत में राजनीतिक ब्रान्डिंग

आजाद हिंदुस्तान के पहले लोकसभा चुनाव 25 अक्टूबर, 1951 से लेकर 21 फरवरी, 1952 के बीच कई चरणों में हुए थे। यह वह दौर था जब देश की आजादी से पूरी जनता उत्साहित थी। आजादी के तमाम बड़े नायक कांग्रेस से ताल्लुक रखते थे। पंडित जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, सरदार वल्लभ भाई पटेल, अबुल कलाम आज़ाद, ए. के. गोपालन, सुचेता कृपलानी, जगजीवन राम, सरदार हुकुम सिंह, रफ़ी अहमद किदवई जैसे लोग चुनाव लड़ रहे थे। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास और विरासत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को तब भी देश की सबसे बड़ी पार्टी बनाए हुए था। प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू जैसी शख्सियत पर देश की जनता तब भी भरोसा करती थी। लेकिन भारतीय राजनीतिक पटल पर कई अन्य राजनीतिक पार्टियां का उदय हो चुका था और यह सभी पार्टियां लोकसभा चुनाव लड़ रही थी। भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी के अलावा डॉॅ. भीमराव अम्बेडकर की रिपब्लिकन पार्टी भी थी, जो अनुसूचित जाति संघ का पुर्नगठन करके बनाई गई थी। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में जनसंघ भी चुनाव मैदान में था और आचार्य कृपलानी की पार्टी किसान मजदूर प्रजा भी।
कांग्रेस का दौर
देश के पहले लोकसभा चुनावों में 52 पार्टियां ने अपने-अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे, लेकिन आधे से भी ज्यादा पार्टियां अपना खाता भी नहीं खोल पाई। नेहरू का आभामंडल इन लोकसभा चुनावों में साफतौर पर दिखाई दे रहा था। डॉ. भीमराव अम्बेडकर जैसे उम्मीदवार मुम्बई से एक साधारण से उम्मीदवार के मुकाबले हार गए। देश के लगभग 17.3 करोड़ मतदाताओं को लुभाने के लिए नेहरू ने पूरे देश में 40 हजार किलोमीटर लंबी यात्राएं की और लगभग 4 करोड़ लोगों को सीधे सम्बोधित किया। उस समय मतदान करने की उम्र 21 वर्ष थी। इन चुनावों को पूरी दुनिया में लोकतांत्रिक तरीके से होने वाला सबसे बड़ा चुनाव प्रयोग माना गया। हालांकि उस समय हिंदुस्तान में अधिकतर अशिक्षित, गरीब और ग्रामीण परिवेश में रहने वाले लोग थे। इनके पास मतदान का कोई पूर्व अनुभव नहीं था। उस समय कोई ये नहीं जानता था कि ये लोग चुनावों में किस तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करेंगे। लेकिन एक बात चुनावों से पूर्व ही साफ दिखाई दे रही थी। वह यह कि भारतीय जनमानस कांग्रेस के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध था और पंडित जवाहर लाल नेहरू में वह एक ऐसे नायक की छवि देख रहा है, जो उनके सपनों और आकांक्षाओं को पूरा कर सकता है। परिणाम, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 489 सीटों में से 364 सीटें मिलीं, जो स्पष्ट बहुमत से बहुत ज्यादा थी। कांग्रेस को 44.99 फीसदी मत हासिल हुए, जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि राजनीतिक पटल पर जनता के बीच नेहरू ब्रान्ड लोकप्रिय बना हुआ था।
लोकसभा के चुनावों में जिस तरह आज धन और बल की जरूरत होती है, पहले ऐसा नहीं था। प्रचार का सीधा सा अर्थ था कि चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार घर-घर जाकर लोगों से सम्पर्क करे, उन्हें अपनी विचारधारा और पार्टी के उद्देश्यों से अवगत कराए। प्रचार सामग्री भी उम्मीदवार को पार्टी द्वारा ही दी जाती थी। इस सामग्री में मूल रूप से पोस्टर और बैनर ही होते थे। उम्मीदवार रैलियों, भाषणों और पदयात्राओं के जरिये लोगों तक पहुंचते थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पास पहले लोकसभा चुनावों में स्टार प्रचारक के रूप में पंडित जवाहर लाल नेहरू थे। दूसरे लोकसभा चुनावों (1957) में भी नेहरू ब्रान्ड का प्रभाव बना रहा। इस बार भी कांग्रेस ने 490 सीटों पर चुनाव लड़ा और 371 सीटों पर उसे विजय मिली। उनके पक्ष में 47.78 प्रतिशत वोट पड़ा, जो पहले लोकसभा चुनावों के मुकाबले पौने तीन प्रतिशत ज्यादा था। यानी भारतीय समाज पर नेहरू का असर एक राजनीतिक ब्रान्ड के रूप में अब भी मौजूद था। देश में लोकसभा के तीसरे चुनावों (1962) में भी स्थितियाँ कमोबेश भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 488 सीटों पर चुनाव लड़े और 361 सीटों पर जीत हासिल की। इस बार उसका वोट प्रतिशत थोड़ा सा गिरकर 44.72 रह गया। लेकिन 1962 में एक बड़ी अंतराष्ट्रीय घटना हुई। चीन ने भारत पर हमला कर दिया। नेहरू को इसकी कतई उम्मीद नहीं थी। भारत उस युद्ध में बुरी तरह परास्त हुआ। नेहरू को व्यक्तिगत रूप से इस हार से बड़ा सदमा लगा और जनमानस के बीच भी उनकी ब्रान्डिंग कमजोर पड़ गयी। 1964 में नेहरू जी की मृत्यु हो गयी और लाल बहादुर शास्त्री को देश का प्रधानमंत्री बनाया गया। उन्होंने ‘जय जवान-जय किसान’ नारा दिया और भारत के हर गाँव में उस दौर का बसे बड़ा राजनीतिक ब्रान्ड बन गये। यदि शास्त्री जी जीवित रहते, तो कांग्रेस के लिए कितने बड़े ब्रान्ड साबित होते, देश को यह बात जांचने का मौका ही नहीं मिला और 1966 में उनका भी निधन हो गया। जब कांग्रेस में नेतृत्व का सवाल उठा तो मोरारजी देसाई के मुकाबले तेजी से उभरते करिश्माई युवा ब्रान्ड इंदिरा गांधी को स्वाभाविक तवज्जो मिली।
कांग्रेस की बागडोर इंदिरा गांधी के हाथ में आ गई। इंदिरा गांधी ने 1967 और 1971 के लोकसभा चुनाव जीतकर यह साबित कर दिया कि वह जवाहर लाल नेहरू की विरासत को सही अर्थों में आगे ले जा सकती है। नेहरू और इंदिरा गांधी के चुनाव अभियानों में जो प्रचार गीत हुआ करते थे, उनमें इन दोनों को ही कांग्रेस और देश का प्रतीक माना जाता था। नेहरू के युग में इन प्रचार गीतों को गाने वाले मोहम्मद रफी और मुकेश जैसे गायक थे। उस दौर में एक गीत से पता चलता है कि किस तरह नेहरू को अधिनायक और भाग्यविधाता की छवि दी गई। गीत के बोल थे, ‘‘नेहरू की सरकार रहेगी, देश की जय जयकार रहेगी’’। एक अन्य गीत के बोल इस तरह थे, ‘‘देखो ना आंच आए तिरंगे की शान को, आजादियां दिलाई हैं हिंदुस्तान को…. बोलो कांग्रेस की जय… बोलो कांग्रेस की जय’’। जाहिर है इन गीतों में कांग्रेस की परम्परा और नेहरू को महान बताने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी गई थी। जनता भी सहज ही इन गीतों पर यकीन कर रही थी। शायद इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि नेहरू (कांग्रेस) के पास आजादी के आन्दोलन का इतिहास विरासत और संस्कृति मौजूद थी।
ऐसा नहीं है कि देश में उस समय नेहरू के अलावा और बड़े नेता नहीं थे। भीम राव अम्बेडकर, आचार्य कृपलानी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, राम मनोहर लोहिया और जय प्रकाश नारायण जैसे नेता उस दौर में मौजूद थे। लेकिन जनता कांग्रेस का पर्याय नेहरू को ही मानती थी, इसलिए जब तक नेहरू जीवित रहे, वे भारतीय राजनीति के सबसे सफल ब्रान्ड के रूप में लोकप्रिय बने रहे। इंदिरा गांधी ने नेहरू के नक्शे कदम पर चलते हुए ही पार्टी पर अपना एकछत्र अधिकार स्थापित करने की कोशिश की। अपने चुनाव प्रचार अभियानों में इंदिरा गांधी ने कवि श्रीकांत वर्मा को कांग्रेस पार्टी के लिए नारे और गीत लिखने का काम दिया। ‘गरीबी हटाओ’ पहला ऐसा नारा था जिसने इंदिरा गांधी की लोकप्रियता को आम आदमी के बीच बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। श्रीकांत वर्मा ने ही ये नारा दिया- ‘जात पर ना पांत पर, इंदिरा जी की बात पर, मोहर लगेगी हाथ पर’। इंदिरा गांधी ने भी अपने प्रचार अभियान के दौरान इस बात का ध्यान रखा कि उनका अभियान पूरी तरह उन्हीं के व्यक्तिगत ब्रान्ड के इर्द-गिर्द रहे और उन्हें कांग्रेस व देश के पर्याय के रूप में प्रचारित किया जाए। इंदिरा गांधी इस बात से भी पूरी तरह वाकिफ थीं कि उनकी पार्टी आंतरिक कलह से जूझ रही है। लेकिन 1967 के लोकसभा चुनावों में जीत हासिल करने के बाद उन्होंने पार्टी के भीतर के आंतरिक कलह को शांत करने की कोशिशें शुरू की। प्रधानमंत्री की शपथ लेने के बाद इंदिरा गांधी ने मोरारजी देसाई को उप प्रधानमंत्री और भारत का वित्त मंत्री नियुक्त किया। मोरारजी देसाई ने नेहरू की मृत्यु के बाद इंदिरा को प्रधानमंत्री बनाए जाने का विरोध किया था। लेकिन इस सब के बावजूद कांग्रेस के भीतर असंतुष्ट गतिविधियां बढ़ती गई। इंदिरा गांधी ने चुनावों की अवधि से एक वर्ष पहले मध्यावधि चुनावों की घोषणा कर दी। गरीबी हटाओ का नारा पहली बार इसी समय सुना गया। इस नारे का असर हुआ और इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने 352 सीटों पर विजय हासिल की। यह इंदिरा गांधी के लिए एक बड़ी जीत थी। 1971 में ही भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान इंदिरा गांधी ने एक साहसिक निर्णय लिया, जिसके परिणामस्वरूप बांग्लादेश मुक्त हो गया। हालांकि तत्कालीन सोवियत संघ और पूर्वी ब्लॉक के देशों को छोड़कर शायद ही किसी अन्य देश ने भारत का अन्तर्राष्ट्रीय समर्थन किया था। बावजूद इसके भारत पाकिस्तान युद्ध में विजय ने इंदिरा गांधी की छवि एक कठोर और कुशल प्रशासक के रूप में बनाई। देखते ही देखते वह भारत का पहला अन्तराष्ट्रीय राजनीतिक ब्रान्ड बन गई।
उठा-पटक का दौर
लेकिन भारत पाकिस्तान युद्ध में आई भारी आर्थिक लागत, दुनिया में तेल की कीमतों में वृद्धि और औद्योगिक उत्पादन में गिरावट ने इंदिरा और कांग्रेस दोनों की कठिनाइयों को बढ़ा दिया था। इसी बीच 12 जून, 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चुनावी भ्रष्टाचार के आधार पर इंदिरा गांधी के 1971 के चुनाव को अवैध घोषित कर दिया। इस्तीफा देने की बजाय इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा कर दी और पूरे विपक्ष को जेल में डाल दिया। आपाताकाल की इस घटना ने एक ब्रान्ड के रूप में इंदिरा गांधी की छवि को पूरी तरह नष्ट कर दिया और अधिनायकत्व का जो इंदिरामयी चेहरा था, वह भी आम जनता के जेहन से एकदम उतर गया। छठे लोकसभा चुनावों में स्वतंत्र भारत में कांग्रेस को पहली बार हार का सामना करना पड़ा। इन चुनावों में कांग्रेस विरोधी एक नारा सबसे ज्यादा लोकप्रिय हआ-इंदिरा हटाओ, देश बचाओ। इंदिरा गांधी सचमुच सत्ता से हटा दी गयीं। स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी। मोरारजी देसाई के नेतृत्व में बनी जनता पार्टी को 296 सीटों पर जीत मिली। मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री बने।
राजनीतिक मार्केटिंग विश्लेषकों के लिए यह समय गहन विचार का समय था, मंथन का समय था। बहुत से सवाल थे, जो उन्हें परेशान कर रहे थे। क्या भारतीय राजनीति में नेहरू और इंदिरा ब्रान्ड का दौर खत्म हो गया है? क्या मोरारजी देसाई के रूप में एक नया ब्रान्ड विकसित होगा? क्या कांग्रेस के साथ जुड़ा इतिहास और विरासत भी इस नये ब्रान्ड के साथ धूमिल हो जाएगी? क्या देश की जनता आपातकाल लगाने के लिए कभी इंदिरा गांधी को माफ कर पायेगी? क्या इंदिरा गांधी दोबारा देश की प्रधानमंत्री बन सकेंगी? और भी बहुत से सवाल थे। तब व्यवसायिक मार्केटिंग की दुनिया समझ रही थी कि एक बार एक ब्रान्ड के पूरी तरह असफल हो जाने के बाद बाजार में उस ब्रान्ड को पहले वाली जगह दिला पाना सम्भव नहीं है। यह तो सम्भव था कि इंदिरा ब्रान्ड राजनीति में मौजूद रहे, लेकिन उसकी पहले वाली छवि दोबारा बनना मुश्किल थी। लेकिन व्यवसायिक मार्केटिंग के सारे सिद्धान्त यहां आकर असफल साबित हो गये। बेशक उनकी इस असफलता में जनता पार्टी में उबर रहे नये ब्रान्ड्स भी अहम कारक साबित हुए। कांग्रेस से निकले चौधरी चरण सिंह और जगजीवन राम जनता गठबंधन का हिस्सा थे। लेकिन वे मोरारजी देसाई से खुश नहीं थे। दिलचस्प बात है कि बेहद कठोर मानी जाने वाली इंदिरा गांधी ने आपातकाल के दौरान मानवाधिकार हनन के लिए गठित अदालतों के सामने खुद को एक परेशान महिला के रूप में चित्रित करने का कोई मौका नहीं गंवाया।
1979 में जनता पार्टी विभाजित हो गई। भारतीय जनसंघ के नेता अटल विहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण अडवाणी ने पार्टी को छोड़ दिया और सरकार से समर्थन वापिस ले लिया। मोरारजी देसाई ने संसद में विश्वासमत खो दिया और प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। चौधरी चरण सिंह ने प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। कांग्रेस ने संसद में चौधरी चरण सिंह के समर्थन का वादा किया था, लेकिन बाद में वह इस वादे से मुकर गई। देश में एक बार फिर चुनावों की घोषणा हो गई। जनता के बीच पूरी शिद्दत के साथ यह सन्देश गया कि गैर कांग्रेसवाद के लिए इस देश में कोई जगह नहीं है। इंदिरा गांधी ने लोकसभा में 351 सीटें जीतकर यह साबित कर दिया कि व्यवसायिक मार्केटिंग के नियम राजनीति मार्केटिंग पर लागू नहीं होते। एक बार फिर इंदिरा गांधी एक बड़े राजनीतिक ब्रान्ड के रूप में उभर कर सामने आईं। जिस जनता पार्टी ने पहली बार कांग्रेस को हराने के कारनामे को अंजाम दिया था। वह जनता पार्टी केवल 32 सीटों तक सिमट गई। लेकिन इसके बावजूद जनता पार्टी का महत्व इसलिए बना रहा क्योंकि इसने यह साबित किया है कि देश में गैर कांग्रेसी सरकार भी बनाई जा सकती है।
1980 तक का राजनीतिक परिदृश्य, चुनाव अभियान के मद्देनज़र कुछ बातें एकदम स्पष्ट करता है। कांग्रेस ने शुरु के तीन लोकसभा चुनाव नेहरू ब्रान्ड के नाम पर जीते। बाद के दो लोकसभा चुनावों में यह ब्रान्ड इंदिरा ब्रान्ड बन गया। जिस तरह कांग्रेस पर पहले नेहरू का वर्चस्व था, उसी तरह बाद में इंदिरा गांधी का वर्चस्व बना रहा। और दोनों के ही शासन काल में नेहरू और इंदिरा कांग्रेस के पर्याय बने रहे। आपातकाल के बाद लोकसभा चुनाव हारने के बावजूद, यदि इंदिरा गांधी सातवां लोकसभा चुनाव (1980) जीतने में सफल रही, तो इसकी सबसे बड़ी वजह यही थी कि कांग्रेस के साथ आजादी के आन्दोलन का इतिहास जुड़ा था, कांग्रेस के साथ जवाहर लाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री जैसे नायक जुड़े थे। इंदिरा गांधी की इस जीत ने यह भी साबित किया कि भारतीय जनमानस की मैमोरी बहुत शार्टटर्म है। यानी वो चीजों को बहुत जल्दी भूल जाती है। आपातकाल की बात भी जनता तीन साल से कम समय में ही भूल गई। कांग्रेस ने खुद को इसी रूप में प्रचारित किया, मानो कांग्रेस ही देश हो। इनके शुरुआती बैनरों और पोस्टरों में भी महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास़्त्री के चित्र यह बताते रहे कि देश को आजाद कराने वाली यही पार्टी है और यही एकमात्र ऐसी पार्टी है जो आजादी के नायकों के सिद्धान्तों पर चल रही है।
31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या ने नेहरू गांधी युग को समाप्त कर दिया। राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने, उन्होंने लोकसभा भंग कर दी। जल्दी चुनाव कराने का मूल कारण था, इंदिरा गांधी के नाम पर सहानुभूति वोट बटोरना। इन चुनावों में कांग्रेस का प्रमुख नारा था-‘जब तक सूरज चांद रहेगा, इंदिरा तेरा नाम रहेगा।’ इन चुनावों में कांग्रेस को 409 लोकसभा सीटें मिलीं। देखते ही देखते सुन्दर, आकर्षक, सौम्य, तेजस्वी और युवा राजीव गांधी भारत का सबसे बड़ा राजनीतिक ब्रान्ड बन गये। हालाकि उन्होंने सभी सीटें इंदिरा गांधी के ही नाम पर ही जीती थीं। लेकिन इन सीटों को जीतने के लिए राजीव गांधी ने देश में ताबड़तोड़ जनसभाएं और दौरे करके खुद को एक ब्रान्ड के रूप में स्थापित कर दिया। इन लोकसभा चुनावों में एक मुख्य ट्रेंड यह दिखाई दिया कि पहली बार एक क्षेत्रीय पार्टी तेलुगु देशम 30 सीटों के साथ दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी।
आते जाते ब्रान्ड
राजीव गांधी ने 21वीं सदी के भारत की कल्पना की और आधुनिक तकनोलॉजी के जीवन्त स्वरूप में खुद को प्रचारित किया। अपने इस विज़न के साथ राजीव गांधी ने अपने व्यक्तिगत ब्रान्ड को नये भारत के विकास करने वाले आधुनिक सोच के राजनेता के रूप में खुद को स्थापित करने का प्रयास किया। यह ब्रान्ड पंडित जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी से अलग तरह का ब्रान्ड था, जो भारत को परम्परागत रूप में ना देखकर आधुनिक नजरिये से देखता था। लेकिन राजनीति के इस नये ब्रान्ड को अपनी उपयोगिता और सफलता साबित करने का मौका नहीं मिला। कांग्रेस बोफोर्स कांड, पंजाब में बढ़ते आतंकवाद, लिट्टे (एल टी टी ई) और श्रीलंका सरकार के बीच गृह युद्ध उन अहम समस्याओं में थे, जो राजीव गांधी को लगातार परेशान कर रहे थे। राजीव सरकार में वित्त मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय का पद संभाल रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह राजीव गांधी के सबसे बड़े आलोचक थे।
ऐसी अफवाह थी कि विश्वनाथ प्रताप सिंह के पास बोफोर्स रक्षा सौदे से जुड़े कुछ ऐसे कागजात थे, जो राजीव गांधी की प्रतिष्ठा को नष्ट कर सकते थे। लिहाजा राजीव गांधी ने वी. पी. सिंह को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया। इसके बाद अनेक दलों ने मिलकर जनता दल बनाया और राजीव गांधी का विरोध शुरू कर दिया। जल्द ही जनता दल में द्रमुक, तेलुगु देशम पार्टी और असम गण परिषद् जैसी पार्टियां भी शामिल हो गई। कांग्रेस विरोधी इस मोर्चे को नेशनल फ्रंट का नाम दिया गया। संभवतः यह पहला चुनाव था, जिसमें भ्रष्टाचार का मुद्दा चुनावी अभियान में छाया रहा और यही वह चुनाव था, जिसने क्षेत्रीय पार्टियों के लगातार मजबूत होने के संकेत दिए थे। नेशनल फ्रंट को बहुमत प्राप्त हुआ और उसने वाम मोर्चे और भारतीय जनता पार्टी के भारी समर्थन से सरकार बनाई।
इन चुनावों की सबसे खास बात यह थी कि 1984 के लोकसभा चुनावों में महज दो सीटें हासिल करने वाली भारतीय जनता पार्टी को 85 सीटें मिली थीं। इन चुनावों में विश्वनाथ प्रताप सिंह और भाजपा नेता लाल कृष्ण अडवाणी दो बड़े व्यक्तिगत ब्रान्डों के रूप में उभरे थे। वी. पी. सिंह देश के प्रधानमंत्री बने और देवीलाल उप प्रधानमंत्री। लेकिन लाल कृष्ण अडवाणी ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मुद्दे पर रथ यात्रा शुरु कर दी। उस रथ यात्रा ने अडवाणी को एक बड़े राजनीतिक ब्रान्ड के रूप में स्थापित करने का काम किया। बिहार में लालू प्रसाद यादव द्वारा अडवाणी को गिरफ्तार किए जाने के बाद पार्टी ने सरकार से समर्थन वापिस ले लिया और विश्वास मत हारने के बाद वी. पी. सिंह ने इस्तीफा दे दिया। कुछ समय के लिए कांग्रेस की मदद से चंद्रशेखर देश के प्रधानमंत्री बने। लेकिन चंद्रशेखर की सरकार भी ज्यादा दिन नहीं चल पाई और देश में मध्यावधि चुनाव होना तय हो गया। यह चुनाव कांग्रेस, भाजपा और राष्ट्रीय मोर्चा (जिसमें जनता दल-एस और वामपंथी शामिल थे) के बीच था। कांग्रेस स्थायित्व के नाम पर वोट मांग रही थी, भाजपा की रणनीति का केन्द्र अयोध्या में राम मन्दिर का निर्माण था। तीसरा मोर्चा गैर कांग्रेसी सरकार के लिए जनमत मांग रहा था।
भाजपा ब्रान्ड का दौर
लेकिन 1991 के इन चुनावों के बीच एक अहम घटना हो गयी। 20 जून को, मतदान के पहले दौर के एक दिन बाद ही राजीव गांधी की हत्या हो गयी। जाहिर है कांग्रेस को राजीव गांधी की मृत्यु से पैदा हुई सहानुभूति का फायदा हुआ, लेकिन यह फायदा इंदिरा गांधी की मृत्यु से होने वाले फायदे की तुलना में नगण्य था। कांग्रेस को इन चुनावों में 232 सीटें मिलीं और भाजपा 120 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर रही। वास्तव में 1984 में केवल 2 सीटें हासिल करने वाली भाजपा के लिए ये साल उत्थान के साल रहे। दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि ये वर्ष कांग्रेस के बेहद खराब साबित हुए। और यही वह समय था, जब क्षेत्रीय पार्टियों की बढ़ती ताकत ने गठजोड़ की राजनीति को जन्म दिया। कांग्रेस ने केन्द्र में सरकार बनाई और कांग्रेस के इतिहास में दूसरी बार ऐसा हुआ कि नेहरू गांधी परिवार से इतर प्रधानमंत्री बना। पीवी नरसिंहा राव देश के प्रधानमंत्री बने। इससे पहले लाल बहादुर शास्त्री ही नेहरू गांधी परिवार से बाहर पहली बार प्रधानमंत्री बने थे।
1996 के लोकसभा चुनावों में पीवी नरसिंहा राव ने संभवतः पहली बार कांग्रेस के चुनाव अभियान को व्यक्तिपरक ना बनाते हुए मुद्दों को प्राथमिकता दी। राव ने अपने पांच साल के कार्यकाल में देश की अर्थव्यवस्था को विदेशी निवेशकों के लिए खोला था। राव ने इसे ही चुनावी मुद्दा बनाया। लेकिन इस दौरान हर्षद मेहता घोटाला, राजनीति का अपराधीकरण, हवाला कांड और तंदूर कांड ने कांग्रेस की छवि को काफी नुकसान पहुंचाया था। गांधी परिवार के किसी सदस्य की राजनीति में सक्रिय भागीदारी ना होने के कारण कांग्रेस में टूट का सिलसिला शुरु हो गया था। नारायणदत्त तिवारी, अर्जुन सिंह, शरद पवार, पी ए संगमा जैसे कई वरिष्ठ कांग्रेसी कांग्रेस छोड़ चुके थे। भारतीय जनमानस को यह लगने लगा था कि शायद कांग्रेस अपने अंत की ओर बढ़ रही है। उधर भाजपा भी एक तरफ हिंदूत्व को और दूसरी तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा को अहम मुद्दा बनाये हुये थी।
राजनीति का यह ऐसा दौर था, जिसमें मतदाता पहली बार भ्रम की सी स्थिति में थे। इन लोकसभा चुनावों में भाजपा 161 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। राष्ट्रपति ने अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने का न्यौता दिया। वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री बन गये। लेकिन 13 दिनों बाद ही उनकी सरकार गिर गयी। इसके बाद के कुछ वर्ष भारतीय राजनीति के लिए काफी उहापोह भरे रहे। इंद्रकुमार गुजराल और देवगौड़ा देश के प्रधानमंत्री बने। लेकिन 1998 में फिर चुनाव होना तय हो गया। यही वह समय था जब सोनिया गांधी ने सक्रिय राजनीति की शुरुआत की। सबसे पहले उन्होंने कांग्रेस कार्यालय आना जाना शुरु किया और नेताओं से मेल मुलाकात करनी शुरु की। गांधी परिवार की विरासत और कांग्रेस की संस्कृति को पुनर्जीवित करने के लिए वह राजनीति के मैदान में कूदीं। फौरन ही सोनिया गांधी कांग्रेस का एक उभरता हुआ ब्रान्ड नज़र आने लगीं। उनके भविष्य को लेकर पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखे जाने लगे।
इस बीच जनता अस्थायी सरकारों से बहुत दुखी आ चुकी थी। कांग्रेस संक्रमण काल से गुजर रही थीं। 1999 के लोकसभा चुनावों तक यही स्थितियां बनी रहीं। लेकिन यह साफ दिखाई पड़ रहा था कि 1991, 1996 और 1998 के चुनावों में भाजपा और उसके सहयोगी दल लगातार मजबूत हो रहे थे। कांग्रेस बहुलता वाले राज्यों उड़ीसा, आंध्र प्रदेश और असम में इन्हें सबसे ज्यादा मत हासिल हुए थे। लिहाजा 1999 के लोकसभा चुनावों में भाजपा नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने 298 सीटें जीतीं और अटल विहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री बने।
इन लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों ने ही स्थायी सरकार को अपने चुनावी अभियान का एजेंडा बनाया। भाजपा ने राम मन्दिर के नाम पर मतों के ध्रुवीकरण की कोशिश की। यह चुनाव कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और अटल विहारी वाजपेयी के बीच व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता का चुनाव था। चुनाव अभियानों में पहली बार सोनिया गांधी के पहली बार विदेशी मूल का मुद्दा छाया रहा। 13 दिन में भाजपा की सरकार के गिर जाने से भी भाजपा के प्रति एक सहानुभूति जनता के बीच देखी गई। इस लोकसभा के चुनाव अभियानों में लाल कृष्ण अडवाणी की कट्टर छवि और अटल विहारी वाजपेयी की उदार छवि का कॉकटेल जनता के बीच परोसा गया और नतीजे एनडीए के पक्ष में आए 13 अक्टूबर को अटल विहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। कांग्रेस इन चुनावों में 136 सीटें प्राप्त करने में कामयाब रही।
अटल बिहारी वाजपेयी को पहले से ही भारतीय जनता पार्टी में एक निर्विवाद ब्रान्ड की हैसियत मिल चुकी थी और 2004 के लोकसभा चुनावों के नतीजों ने इसे मजबूत ही किया। राजनीतिक विश्लेषक भी इनका कोई अंदाजा नहीं लगा पाए थे। वाजपेयी सरकार के पांच साल कई दृष्टियां से उपलब्धियों के साल कहे जा सकते हैं। भाजपा के शासनकाल में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार सौ अरब डॉलर से अधिक पहुंच गया था, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड था। वाजपेयी सरकार ने सेवा क्षेत्र में बड़ी संख्या में नौकरियां उपलब्ध कराईं। इस दौरान अर्थव्यवस्था में लगातार वृद्धि देखी गई और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के विनिवेश को पटरी पर लाया गया था। भाजपा ने अपने चुनाव अभियानों में फील गुड, इंडिया शाइनिंग और भारत उदय जैसे नारों को अपनी कैचलाइन बनाया। यही वह समय था जब राजनीतिक मार्केटिंग के क्षेत्र में राजनीतिक विज्ञापनों का टेलीविज़न पर उदय हुआ। भाजपा ने अपने चुनावी अभियान ‘इंडिया शाइनिंग’ को टेलीविजन पर लॉन्च किया। इसने भारत में टेलीविज़न पर राजनीतिक विज्ञापन के एक नये युग का आगाज किया। लेकिन इस सब के बावजूद यह अभियान सफल नहीं हो पाया। कांग्रेस ने इंडिया शाइनिंग को काउंटर करने के लिए अभियान चलाया इंडिया चिटेड। कांग्रेस ने भाजपा के इंडिया शाइनिंग अभियान के समानांतर एक सवाल के रूप में अपना अभियान चलाया। सवाल था- ‘आम आदमी को क्या मिला?’ इस अभियान में कहा गया कि एनडीए के फील गुड फेक्टर से जनता को कोई लाभ नहीं पहुंचा। अपने अभियान के लिए कांग्रेस ने भी प्रोफेशनल एडवरटाइजिंग कम्पनी को इस्तेमाल किया। कांग्रेस के अधिकांश विज्ञापनों में गरीबों को दिखाया गया और इनकी पंचलाइन थी- ‘वो हुकूमत किस काम की जिसमें गरीब की जिंदगी में सुख-चैन नहीं है। सोचिए! कांग्रेस का हाथ गरीबों के साथ।
लेकिन कांग्रेस और भाजपा दोनों के अभियानों के बावजूद अधिकांश विश्लेषकों का यही मानना था कि भाजपा अपने चुनावी अभियान से सत्ता विरोधी लहर को मात देकर दुबारा सत्ता पर काबिज हो जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भाजपा को 116 सीटें मिलीं और कांग्रेस एक बार फिर सबसे बड़े दल के रूप में उभरा। बेशक कांग्रेस ने इन लोकसभा चुनावों में केवल 145 सीटें ही हासिल की थीं, लेकिन बसपा, सपा, एनडीएमके और वाम मोर्चे के भारी समर्थन से कांग्रेस सरकार बनाने में सफल रही। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के पास इस समय प्रधानमंत्री बनने का अवसर था, लेकिन उन्होंने प्रधानमंत्री की कुर्सी मनमोहन सिंह को भेंट कर दी। मनमोहन सिंह ने पांच साल सरकार चलाई। उसके बाद 2009 में हुए लोकसभा चुनावों में भी कांग्रेस ने भाजपा के मुकाबले बढ़त हासिल की और 206 सीटें प्राप्त की, जबकि भाजपा को केवल 116 सीटें मिलीं। इस समय यह लगने लगा था कि भाजपा एक बार फिर अपने उतार पर है। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनावों ने इसे गलत साबित कर दिया।
ब्रान्ड नरेन्द्र मोदी
जून 2013 में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में नरेंद्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी के लोकसभा चुनावों के अभियान की कमान सौंपी गई। भाजपा के लिए यह एक बहुत बड़ा फैसला था। लाल कृष्ण अडवाणी जैसे नेताओं ने इस फैसले का विरोध किया, लेकिन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने उनके विरोध को दरकिनार कर दिया। भाजपा के भीतर और बाहर मोदी को चुनाव अभियान सौंपे जाने को अलग अलग नजरिये से देखा गया। मोदी के ऊपर गोधरा कांड का बदनुमा दाग था, उनकी छवि एक कट्टरवादी हिंदू की थी। गुजरात से बाहर काम करने का उनके पास कोई अनुभव नहीं था। लेकिन 2004 और 2009 के लोकसभा चुनाव हार चुकी भारतीय जनता पार्टी इस बार हर हालत में सत्ता पर काबिज होना चाहती थी।
13 सितम्बर 2013 को संसदीय बोर्ड की बैठक में मोदी का नाम प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में घोषित कर दिया गया। अब गेंद पूरी तरह नरेंद्र मोदी के पाले में थी। उन्हें यह साबित करना था कि जो करिश्मा वह गुजरात में तीन बार कर सकते हैं, क्या वही करिश्मा वह एक बार केंद्र में भी दोहरा सकते हैं। मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की कवायद 2012 के अंतिम महीनों में उस वक्त शुरू हो गई थी, जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और नरेंद्र मोदी के बीच पैचअप की शुरुआत हुई। वास्तव में आरएसएस ने ही नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने का मंच तैयार किया। चुनाव अभियान की कमान संभालने के बाद मोदी के सामने कई अहम मुद्दे थे। क्या मोदी भारतीय जनता पार्टी को उसी ट्रैक पर आगे ले जा सकते हैं, जहां अटल विहारी वाजपेयी और आडवाणी ने छोड़ा था? क्या वह अपनी हिंदु कट्टरवादी छवि के जरिये लोकसभा में भाजपा को जितवा सकते हैं? क्या परम्परागत भारतीय मतदाता जातिवाद, धर्म और कट्टरवाद से ऊपर उठकर मत देने के लिए राजी हो पायेगा? क्या राम मंदिर के नाम पर 2 से 85 सीटों पर पहुंची भारतीय जनता पार्टी को लोग राम मंदिर से इतर स्वीकार कर पायेंगे? सवाल और भी बहुत थे, लेकिन नरेंद्र मोदी ने इन सब सवालों से ऊपर उठते हुए सबसे पहले अपनी और भाजपा की छवि को एक नया रूप देने की कोशिश की।
मोदी की टीम
टेक्नोसेवी नरेंद्र मोदी चुनाव अभियान की महत्ता अच्छी तरह जानते थे। वे जानते थे कि किसी भी चुनावी अभियान को सही ढंग से चलाने के लिए एक बेहतरीन टीम का होना बहुत जरूरी है। लिहाजा उन्होंने एक शानदार टीम का गठन किया। इस टीम में अमित शाह को छोड़कर अधिकांश सदस्य गैर राजनीतिक थे। इस टीम में के. कैलाशनाथन अहम भूमिका में थे। 1979 बैच के आई एस ऑफिसर के. कैलाशनाथन पिछले आठ साल से गुजरात में मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव के रूप में काम कर रहे थे। उन्होंने मोदी के लिए दक्षिणी राज्यो ंखासकर तमिलनाडु में छोटी और क्षेत्रीय पार्टियां से गठजोड़ की रणनीति बनाई। इस रणनीति ने दक्षिण भारत में मोदी की राह आसान की।
अमेरिका में शिक्षित प्रशांत किशोर ने अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव अभियानों की तर्ज पर मोदी के लिए आक्रामक रणनीति बनाई। उन्होंने एक जवाबदेह सरकार के लिए बहुत से आई आई टी पासआउट को अपने साथ जोड़ा। प्रशांत राजनीतिक मुद्दों के साथ साथ मोदी को यह सलाह भी देते रहे कि किन पार्टियों के साथ गठजोड़ करना है। 2014 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी ने सूचना प्रौद्योगिकी का भी भरपूर इस्तेमाल किया। मोदी की टीम ने हीरेन जोशी, राजेश जैन और बी. जी. महेश की तकनीकी रूप से सक्षम तिकड़ी को अपने साथ जोड़ा, जो हर समय उन्हें टेक्नोलॉजी बैकअप कराती रही। कई अन्य आई ए एस ऑफिसर्स के साथ मोदी की टीम में थे। मोदी की छवि बनाने, उन्हें ब्रान्ड के रूप में पेश करने और उनके भाषण तैयार करने की जिम्मेदारी 1988 बैच के आईएएस अधिकारी अरविंद कुमार शर्मा के पास थी।
मोदी यह बात अच्छी तरह जानते थे कि लोकसभा चुनावों में जीत का रास्ता उत्तर प्रदेश से ही गुजरता है। मोदी ने उत्तर प्रदेश को फतह करने के लिए अपने सबसे विश्वसनीय और करीबी सलाहकार अमित शाह को उत्तर प्रदेश की बागडोर सौंप दी। अमित शाह को एक बेहतरीन चुनाव प्रबंधक माना जाता है। 1991 में वह गांधी नगर में लाल कृष्ण अडवाणी और 1996 में अटल विहारी वाजपेयी के चुनाव अभियान की कमान संभाल चुके थे। उन्हें एक चतुर रणनीतिकार माना जाता है। अमित शाह ने बड़ी चतुराई से उत्तर प्रदेश में अपने भाषणों के दौरान कट्टरपंथी हिंदुत्व के मुद्दे को उठाकर भाजपाई कैडर में एक नया जोश और उत्साह भरा। उन्होंने मोदी को इस बात की सहूलियत दी कि वे हिंदुत्व जैसे मुद्दे को हाशिये पर रखकर विकास के मुद्दे की बात करें।
अपनी रणनीति के तहत अमित शाह ने उत्तर प्रदेश में युवा उम्मीदवारों को तरजीह दी, ताकि दलितों और ब्राहमण मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित किया जा सके। अमित शाह ने ही नरेंद्र मोदी को बनारस से चुनाव लड़ने का सुझाव दिया, ताकि पूर्वी उत्तर प्रदेश और पड़ोसी राज्य बिहार की कुछ सीटों को प्रभावित किया जा सके। अमित शाह ने लखनऊ में सोशल मीडिया वार रूम तैयार किया, जहां बीजेपी कार्यकर्ता और स्वयं सेवक, सोशल मीडिया, तमाम खबरों और पूरे चुनावी अभियान का निरीक्षण कर सकें। लोकसभा में उत्तर प्रदेश से भाजपा को मिली 73 सीटों के पीछे अमित शाह की रणनीति ही काम कर रही थी। जब अमित शाह ने उत्तर प्रदेश की बागडोर संभाली तो वह जानते थे कि 2009 में भाजपा को लोकसभा चुनावों में महज नौं सीटें मिली थीं और उनका मत प्रतिशत केवल 15 था।
शाह ने अपने चुनाव अभियान की शुरुआत के लिए जो रणनीति बनाई वह भाजपा के खोये हुए गौरव को लौटाने से शुरु हुई। शाह ने लोगों से सम्पर्क और संवाद करने के लिए मई 2013 से लेकर मई 2014 तक 9300 किलोमीटर की यात्राएं की। ये यात्राएं रेल और सड़क मार्गों द्वारा की गयीं। इन यात्राओं में शाह ने मोदी के सन्देश और विकास के नजरिये को उत्तर प्रदेश के 80000 गांवों में पहुंचाया। शाह ने भाजपा के हारे हुए सांसदों और विधायकों के साथ भी बैठकें की और हार के कारणों को जानने का प्रयास किया। उन्होंने राज्य में जाति संतुलन को दोबारा स्थापित करने का फैसला किया। अमित शाह ने जमीनी स्तर पर पार्टी को जीवित किया। स्थानीय नेताओं से कहा गया कि वे स्कूलों और कॉलेजों में मोदी लहर को पहुंचाएं। दूर दराज के गांवों तक पहुंचने के लिए अमित शाह विशेष रूप से निर्मित 450 रथों को तैयार करवाया। इन रथों में एलसीडी स्क्रीन लगवाई गयी थी, जिस पर मोदी पर एक शॉर्ट फिल्म बराबर दिखाई गयी। टिकट वितरण के मामले में भी अमित शाह ने कुछ सीटों को छोड़कर उन्हीं लोगों को टिकट दिया, जो स्थानीय थे और अपने संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते थे। अमित शाह की पूरी रणनीति उत्तर प्रदेश में भाजपा को उसकी जड़ों से जोड़ने की थी। अमित शाह ने यह सुनिश्चित किया कि उत्तर प्रदेश में होने वाली मोदी की रैलियों में ही गांव से कम से कम एक जीप में भरकर स्थानीय लोग पहुंचे। इसने उत्तर प्रदेश के गांवों के कम से कम सत्तर फीसदी लोगों को सीधे नरेंद्र मोदी के सम्पर्क में लाने का काम किया। ये तमाम लोग मोदी को प्रत्यक्ष रूप से सुन पाए और भावी विकास पुरुष को देख पाए। नरेंद्र मोदी के चुनाव अभियान में अमित शाह ने यह दिखाया कि किसी भी शक्तिशाली चुनाव अभियान के लिए सही समय पर सही फैसला लेना कितना जरूरी होता है। अमित शाह ने जहां ज़रूरी हुआ उत्तर प्रदेश में हिंदू कार्ड खेलने में भी कोताही नहीं बरती। इसका नतीजा यह हुआ कि उत्तर प्रदेश में रिवर्स पोलराइजेशन हुआ यानी मुस्लिम मतों का धु्रवीकरण हुआ तो उसकी प्रतिक्रिया में हिंदू मतों का धु्रवीकरण भी भाजपा के पक्ष में हुआ। लिहाजा उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को 80 में से 73 सीटें मिली। मोदी के चुनाव अभियान की सफलता का श्रेय बहुत कुछ उत्तर प्रदेश को ही जाता है।
छवि निर्माण
नरेंद्र मोदी ने अपने चुनाव अभियान की शुरुआत छवि निर्माण से की। मोदी अब तक गुजरात दंगों, फर्जी मुठभेड़ों, एक महिला की जासूसी करवाने वाले और चहेते कॉरपोरेट घरानों को लाभ पहुंचाने वाले शख्स के रूप में बदनाम किये जाते थे। इसके उलट मोदी की टीम ने मोदी को एक सख्त, प्रभावी और सफल विकास पुरुष के रूप में पेश किया। जब मतदाताओं के बीच नरेंद्र मोदी की यह छवि आकार लेने लगी, तब नरेंद्र मोदी के चुनाव अभियान ने गति पकड़नी शुरु की। नरेंद्र मोदी ने 25 मार्च से 30 अप्रैल के बीच देश भर में 155 रैलियां कीं। इस दौरान नरेंद्र मोदी ने लगभग ढाई लाख किलोमीटर की यात्रा की और वह करोड़ों लोगों से मुखातिब हुए। 1 मई से 10 मई के बीच नरेंद्र मोदी ने पांच राज्यों में 45 रैलियां की और पचास हजार किलोमीटर की यात्रा की। मोदी ने उत्तर प्रदेश में आठ, कर्नाटक में चार, बिहार में तीन, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, असम और उड़ीसा में दो और हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, उत्तराखंड, झारखंड, गोवा, जम्मू और कश्मीर, पश्चिम बंगाल, मणिपुर, केरल, अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, त्रिपुरा और पंजाब में एक एक रैलियां की। अपने पूरे चुनाव अभियान के दौरान नरेंद्र मोदी ने 440 रैलियां और कार्यक्रम किए। साथ ही नरेंद्र मोदी ने 1350 3-डी रैलियां भी की। जिनमें वह वर्चुअल रियेलिटी तकनीक के जरिये मंच पर उपस्थित दिखते थे। ग्रामीण मतदाताओं के साथ ही शहरी लोगों में भी उनके 3-डी कार्यक्रम बहुत चर्चित हुये। मोदी के प्रचार अभियान में चाय पर चर्चा भी खासी चर्चित रही। मोदी ने 4000 से ज्यादा स्थानों पर चाय पर चौपाल कार्यक्रमों का आयोजन किया। इस दौरान नरेंद्र मोदी की तस्वीर वाले कपों में नमो चाय पेश की गयी। एक अंदाजे के मुताबिक नरेंद्र मोदी ने अपने अभियान के दौरान 20 करोड़ से अधिक लोगों से संपर्क और संवाद स्थापित किया। नरेंद्र मोदी ने अखबारों, चैनलों, रेडियो, सोशल मीडिया, ट्विटर, फेसबुक, यूट्यूब पर लगातार लोगों से सम्पर्क बनाए रखा। उनका चुनाव अभियान किस तीव्रता के साथ आगे बढ़ा, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अंतिम चरण के मतदान से पहले दिन आठ चैनलों पर नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू एक साथ आ रहा था। न्यूज चैनलों के प्राइम टाइम पर कवरेज और चर्चाओं में भी नरेंद्र मोदी को 33 फीसदी जगह मिली, जबकि राहुल गांधी को सिर्फ चार फीसदी।
नरेंद्र मोदी ने अपने चुनाव अभियान पर लगातार नजर रखने, उसका असर जानने, विपक्षियों के अभियान की जानकारी लेने और जनता की प्रतिक्रिया जानने के भाजपा के मुख्यालय अशोक रोड नई दिल्ली में एक डिज़िटल वार रूम बनवाया। इसमें आईआईटी और आईआईएम के 40 पेशेवर लोग 24 घण्टे काम करते रहे। ये लोग लगातार मतदाताओं के रुझान और मूड पर नजर रखे रहे। इस टीम के एक सदस्य ने बताया, हमारे पास चालीस लाख स्वयंसेवकों की एक टीम थी, जिसमें देश के कोने कोने से एक लाख स्वयंसेवक वोटरों को जोड़ रहे थे। हमारी टीम देश में होने वाली हर राजनीतिक गतिविधि पर फोन, इंटरनेट, सोशल मीडिया और विभिन्न सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जरिये नजर रखे हुए थी। सचमुच 360 डिग्री के इस चुनावी अभियान में विभिन्न मंचों फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सएप के जरिये नरेंद्र मोदी को लोगों से जोड़ा जा रहा था। देश के किसी भी कोने में बैठा कोई भी व्यक्ति मोदी के भाषणां को फोन पर भी सुन सकता था।
मोदी के चुनाव अभियान की एक आई टी टीम ने व्हाट्सएप पर 150 ग्रुप बनाये, जो स्वयंसेवकों के लगातार सम्पर्क में बने रहते थे। यानी मोदी के चुनाव अभियान में मुख्य फोकस अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचना था और चुनाव प्रबन्धन में इसे व्यवहारिक रूप से सम्भव कर दिखाया।
विदेशों में मोदी ब्रान्डिंग

नरेंद्र मोदी ने अपने चुनावी अभियान और छवि निर्माण को केवल भारत तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्होंने और उनकी टीम ने वैश्विक स्तर पर इसे चलाया। गौरतलब है कि विदेशों में मोदी की छवि एक दागदार नेता की रही है। 2005 में जब मोदी को अमरीका ने वीज़ा देने से मना कर दिया तो उनकी नकारात्मक छवि पूरी दुनिया तक पहुंची। लिहाज़ा अपनी अन्तर्राष्ट्रीय छवि को सुधारने के लिए नरेंद्र मोदी ने प्रोफेशनल लॉबिस्ट, पूर्व राजनयिक, नामी-गिरामी विचारक, प्रभावशाली एनआरआई संस्थाओं को शामिल किया। इस अभियान में विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन जैसी संस्थाएं शामिल हुई, जिसका नेतृत्व इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व प्रमुख अजीत डोभाल कर रहे थे। इसके अलावा भारत में पूर्व अमेरिकी राजदूत रॉबर्ट ब्लैक विल लॉबिंग संस्था, एप्को वर्ल्ड वाइड, इण्डियन अमरीकन फॉर फ्रीडम, आरएसएस से जुड़ा हिंदू अमरीकन फाउंडेशन और यू एस इंडिया पॉलीटिकल एक्शन कमेटी भी इस अभियान से जुड़े थे। ये संस्थाएं अपने अपने तरीके से विश्व स्तर पर मोदी की स्वीकार्यता बढ़ाने में लगे थे। भारतीय जनता पार्टी का विदेशी मामलों का सेल इनके साथ मिलकर काम कर रहा था। अमरीका में बसी गुजराती आबादी इस पूरे अभियान में सहयोग कर रही थी। यह एक बड़ा ब्रान्डिंग अभियान था जो मोदी की कट्टरपंथी हिंदुत्व से जुड़ी छवि को खत्म करना चाहता था। इस अभियान में ब्रिटेन के भी अनेक अहम लोग शामिल थे। बाद में जिस तरह नरेंद्र मोदी को 2014 के लोकसभा चुनावों में विजय के बाद अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने बधाई देकर अमरीका आने का न्यौता दिया, उसने यह साबित कर दिया है कि नरेंद्र मोदी विदेशों में भी अपनी छवि सुधारने के अभियान में सफल रहे।
मोदी की चुनावी थीम और भाषण
अमरीकी राष्ट्रपति चुनावों में दो बार चुनावी रणनीतिकारों ने अमरीका को फिर से महान बनाने की थीम पर काम किया है। दोनों ही बार उन्हें बहुत सफलता मिली। पहली बार रोनॉल्ड रीगन ने 1980 में यह नारा दिया कि ‘आइये अमरीका को फिर से महान बनायें’, इसके 12 वर्ष बाद बिल क्लिंटन ने राष्ट्रपति चुनावों में अपने भाषणों में इसी मुद्दे को बार-बार दोहराया कि अमरीका विश्व का सबसे महान राष्ट्र कैसे बना रह सकता है? 2016 में हुये राष्ट्रपति चुनावों में डोनॉल्ड ट्रम्प ने इस नारे को छोटा करके अपनाया, ‘अमरीका को फिर से महान बनायें’।
नरेंद्र मोदी की टीम ने इसी मुद्दे से प्रेरणा लेकर नये और मजबूत भारत के पुर्ननिर्माण को अपनी चुनावी थीम का मुख्य केंद्र बिंदु बनाया। उन्होंने तय किया कि वे लोकप्रियता की ऐसी परिभाषा गढ़ेंगे, जो कांग्रेस की मुस्लिम टोपी वाली धर्मनिरपेक्षता को खारिज करती हो। उन्होंने खुद को एक आम आदमी, एक मजदूर के रूप में चित्रित किया। नरेंद्र मोदी यह भी भली-भांति जानते थे कि भारत को लंबे समय तक धर्मनिरपेक्षता लुभाती रही है। ऐसी धर्मनिरपेक्षता जो विविधता को स्वीकार भी करती है और उसका जश्न भी मनाती है। मोदी यह भी जानते थे कि भारत में ही एक ऐसा विचार भी बराबर तैरता रहता है जो विभाजित भारत का प्रतिनिधित्व करता है और एकरूपता को पूछता है। मोदी ने इन दोनों विचारों की लड़ाई को एक अलग तरह की लड़ाई में बदल दिया। यह लड़ाई थी प्रतिभाशाली भारत और सामंती भारत के बीच। जाहिर है मोदी ने खुद को प्रतिभाशाली भारत का प्रतिनिधित्व के रूप में पेश किया। उन्होंने जनमानस के उस सोये हुए सपने को जगा दिया, जो भारत को प्रगतिशील देखना चाहता था। मोदी ने खुद को एक विकास पुरुष के रूप में प्रस्तुत किया। गुजरात मॉडल का जिक्र करना नरेंद्र मोदी किसी भी चुनावी रैली में नहीं भूले। नरेंद्र मोदी की रैलियों में दो बातें स्पष्ट रूप से कही गई- एक तरफ मोदी ने जाति, धर्म और सम्प्रदाय से ऊपर उठकर विकास की बातें कहीं, विकास के सपने दिखाए, वहीं दूसरी ओर मोदी ने यह भी बताया कि अब तक यह विकास कांग्रेस की वजह से ही रुका हुआ था। कांग्रेस शासन काल में हुए घोटालों का जिक्र करना भी वह किसी रैली में नहीं भूले।
कांग्रेस की लगातार आलोचना करने के बावजूद जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को देहाती औरत कहा तो मोदी मनमोहन सिंह के पक्ष में खुल कर बोले। उन्होंने इसे भारत के सवा सौ करोड़ लोगों का अपमान बताया। इस तरह नरेंद्र मोदी ने एक तरफ खुद को राष्ट्रभक्त के तौर पर पेश किया और दूसरी तरफ पाकिस्तान विरोधी भावनाआें को भी अपने पक्ष में करने की कोशिश की। नरेंद्र मोदी ने अपने भाषणों का सुर मजाकिया भी बनाए रखा। सोनिया गांधी के लिए मैडम जी और राहुल गांधी के लिए शहजादे शब्द का इस्तेमाल कर उन्होंने खूब तालियां बटोरी। मोदी के भाषणों में लोगों को भविष्य के विश्वशक्ति भारत के सपने दिखाई पड़ते थे, तो दूसरी तरफ कांग्रेस का भ्रष्टाचार। उनकी भाषा इस तरह की होती थी कि आम आदमी भी उसे आसानी से समझ सके और उसका लुत्फ भी उठा सके। बंगलुरू की एक रैली में उन्होंने कहा यदि आप 2-जी घोटाले की राशि (1.76 लाख करोड़) सड़क पर लिखने लगे तो उसकी आखिरी जीरो दस जनपथ तक पहुंच जाएगी। दिल्ली की एक रैली में मोदी ने कहा कि सपेरों के देश से अब हमारा देश अब कम्प्यूटर और लैपटॉप के देश में बदल गया है। हमारे युवा आईटी सेक्टर में माउस के एक क्लिक से पूरी दुनिया को एक नया आकार देने में लगे हैं। मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने के लिए नरेंद्र मोदी ने पटना की एक रैली में कहा मुस्लिम भाइयां आप किसके खिलाफ लड़ना चाहते हैं, हिंदुओं से या गरीबी से? आइये, हम सब मिलकर गरीबी से लड़ें। अमेठी की एक रैली में नरेंद्र मोदी ने कहा हम बदला नहीं चाहते, बदलाव चाहते हैं। मोदी ने यह बात अमित शाह के उस बयान के असर को कम करने के लिए कही थी, जिसमें शाह ने कहा था कि अपमान का बदला तो लेना ही होगा। मोदी के चुनाव प्रबंधनक को नियंत्रित कर रही टीम ने इस बात का भरपूर ध्यान रखा कि मोदी को कहां क्या बोलना है।
ब्रान्ड मोदी के सबक
किसी भी चुनाव अभियान में यह जरूरी है कि उम्मीदवार खुद को हर मौके पर जनता के बीच एक विजेता की तरह पेश करे। नरेंद्र मोदी ने अपने पूरे चुनाव अभियान के दौरान इस तथ्य का सदा ध्यान रखा। उन्होंने कभी सफेद तो कभी रंगीन आधी आस्तीन के कुर्ते पहने। और कई बार कुर्तों पर जैकेट पहनी। जनता ने इस जैकेट को मोदी जैकेट के रूप में ही नये टें्रड के रूप में स्वीकार किया। यह पूरी ड्रेस नरेंद्र मोदी को एक गम्भीर छवि प्रदान करती थी। चुनावी रैलियों के दौरान उनकी बॉडी लैंग्वेज हमेशा ऐसी रही जो जनता का प्रतिनिधि भी है और जनता के बीच का ही आदमी है। जो शासक भी है और मजदूर भी। जो जनता की जुबान बोलता और समझता है। जो जनता के दुःख दर्द को अच्छी तरह समझता है। इसलिए जहां आवश्यकता हुई नरेंद्र मोदी ने खुद को एक चाय वाले के रूप में प्रचारित करने में भी कोई कोताही नहीं बरती। खुद को चाय वाला बताकर नरेंद्र मोदी एक तरफ आम जनता का विश्वास जीत रहे थे तो दूसरी तरफ वे गरीब लोगों से खुद को कनेक्ट कर रहे थे। मोदी की चुनावी रैलियों में कहीं भी निराशा की बात दिखाई नहीं पड़ती। लोगों से खुद को कनेक्ट करने के लिए मोदी जब पंजाब गये तो उन्होंने सिर पर पगड़ी बांधी, असम गये तो वहां की परम्परागत भाषा में बोलते नज़र आये। बंगाल की रैली में मोदी ने जनता को बंगला में सम्बोधित किया। यानी नरेंद्र मोदी जहां गये, लोगों को वहीं के लगे। चुनाव अभियानों के दौरान यह प्रवृत्ति सबसे ज्यादा इंदिरा गांधी में देखी गयी थी। वह जिस भी राज्य में चुनाव प्रचार के लिए जाती थीं, खास वहीं की साड़ी पहनती थी। चुनाव अभियान में परिधानों का चयन लोगों से कनेक्ट करने का एक बडा जरिया माना जाता है। लोगों से जुड़ाव पैदा करने के लिए ही मोदी के रणनीतिकारों ने बड़ी चतुराई से मोदी के भाषण तैयार किये। और मोदी ने किसी अभिनेता की तरह जनसंवाद की शैली में उन्हें लोगों तक पहुंचाया। स्पष्ट है कि किसी भी चुनावी अभियान में अपनी बात कहना तो महत्वपूर्ण होता है लेकिन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण होता है, बात को कहने का ढंग। साथ ही चुनावी अभियान में इस बात का भी भरपूर ध्यान रखना होता है कि बात कहां कही जा रही है, वहां का सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक माहौल किस तरह का है, वहां के लोग किस भाषा और मुहावरे को अच्छी तरह समझते हैं। मोदी ने इन सब बातों का ध्यान रखा और अपने चुनावी अभियान को दिशा दी।
नारे और उनकी भाषा
नरेंद्र मोदी की जीत में उनके चुनावी अभियान की महत्ता को सभी ने एक सुर में स्वीकार किया है। उन्होंने चुनाव प्रचार के हर चरण में नये किस्म के नारों का उपयोग किया। इससे यह सीखा जा सकता है कि चुनाव प्रचार में अलग-अलग नारे इस्तेमाल करना बहुत फायदा करता है। मोदी ने अपने चुनाव अभियान के नारों का मुख्य फोकस जनता से सीधे संवाद को बनाया। उनकी स्पष्ट हिदायत थी कि जमीनी तौर पर लोगों को जोड़ने और लोगों से जुड़ने वाले सन्देश तैयार किये जाएं। पूरे चुनाव अभियान में नरेंद्र मोदी को पोस्टर ब्वाय के रूप में पेश किया गया। मोदी के चुनाव अभियान के पहले चरण में जो नारा सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुआ वह था ‘जनता माफ नहीं करेगी।’ उसमें मोदी ने अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस की गलतियों की बात की।
यह नारा जब मतदाताओं के बीच लोकप्रिय हो गया तो अभियान के दूसरे चरण में कांग्रेस शासन में फैले भ्रष्टाचार, महंगाई, बिजली पानी की समस्या, किसानों पर हुए अत्याचारों पर फोकस किया गया। ‘अबकी बार मोदी सरकार’ की टैग लाइन के साथ नये नारे थे-बिजली पानी को हाहाकार-अबकी बार मोदी सरकार, बहुत हुई महंगाई की मार-अबकी बार मोदी सरकार, बहुत हो चुका भ्रष्टाचार-अब की बार मोदी सरकार, बहुत हुआ किसानों पर अत्याचार-अबकी बार मोदी सरकार, बहुत हुआ महिलाओं पर अत्याचार-अबकी बार मोदी सरकार।
ये सभी नारे वास्तव में ये सन्देश दे रहे थे कि हर समस्या का समाधान मोदी ही कर सकते हैं। जब ये सन्देश आम जनता के बीच लोकप्रिय हो गये तो मोदी का चुनाव अभियान चलाने वालों ने ‘हर हर मोदी, घर घर मोदी’, ‘नयी सोच नयी उम्मीद’, ‘टाइम फॉर चेंज, टाइम फॉर मोदी’ जैसे नारे से चुनाव अभियान का माहौल बदल कर रख दिया। इस चुनाव अभियान की एक और खासियत यह रही कि मोदी के संदेशों को एक साथ अखबारों, रेडियो और टेलिविजन पर चलाया गया। इससे इनका असर बेपनाह बढ़ गया। गंभीरता से देखें तो अबकी बार मोदी सरकार नारा, 1998 में अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में लड़े गये चुनावों में भाजपा को मिले फायदे को हासिल करने के लिए था। गौरतलब है कि उस समय सबसे लोकप्रिय नारा था-अबकी बारी, अटल बिहारी। अबकी बार मोदी सरकार इसी तर्ज पर तैयार किया गया था।
मोदी भारत की विविधता को अच्छी तरह से जानते थे, लिहाजा उन्होंने कमोबेश हर भाषा में अपने नारे तैयार कराये, यानी ‘अबकी बार मोदी सरकार’ का उनका सन्देश हर भाषा में भारत के हर प्रांत और क्षेत्र तक पहुंचा। इस अभियान की एक और खास बात यह रही कि यह अभियान पूरी तरह नरेंद्र मोदी पर आधारित रहा। नरेंद्र मोदी अपनी रैलियों में जनता से आंख मिलाकर यह कहते हुए नजर आए कि कमल के निशान पर बटन दबाने से सीधा उन्हें वोट मिलेगा। ‘अबकी बार मोदी सरकार’ को सोशल मीडिया, एसएमएस, व्हाट्स अप, ट्विटर और फेसबुक पर इस तरह प्रचारित किया गया कि लोग इस नारे को अपने हिसाब से ढाल सकें।
अबकी बार मोदी सरकार पर इतने जोक्स बने जितने पहले शायद ही किसी नारे पर बने होंगे। लोगों ने रस ले लेकर इस नारे में पार्टिसिपेट किया और नये नारे बनाये। जैसे राहुल को पड़ी मम्मी की मार, अबकी बार मोदी सरकार, देखा है पहली बार साजन की आंखों में प्यार, अबकी बार मोदी सरकार, क्या आप करते हैं अपनी बीवी से प्यार, अबकी बार मोदी सरकार, चलाता हूं मैं वैगन-आर, अबकी बार मोदी सरकार, चमत्कार पर चमत्कार, अबकी बार मोदी सरकार, अब तो मौन तोड़ दो सरदार, अबकी बार मोदी सरकार, आई डोंट नो हूं यू आर, अबकी बार मोदी सरकार, आलोकनाथ जी हमें सिखायेंगे संस्कार, अबकी बार मोदी सरकार, फिर तेज हो विकास की रफ्ता्र, अबकी बार मोदी सरकार। ये वास्तव में नरेंद्र मोदी के चुनाव अभियान में लोगों की अप्रत्यक्ष भागीदारी सुनिश्चित कर रहा था। लोग अपनी क्रिएटिव और हास्य क्षमताओं का इस्तेमाल कर रहे थे, लेकिन इससे मोदी घर घर पहुंच रहे थे।
चुनाव अभियान के अगले चरण में ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ नारा आया। ये नारा मोदी के चुनाव अभियान को ही आगे ले जाने वाला था। ये नारा बता रहा था कि अब मतदाताओं के अच्छे दिन आने वाले हैं, देशवासियों के अच्छे दिन आने वाले हैं। इस नारे में ये अंतर्निहित था कि मोदी की सरकार आने ही वाली है। किस तरह मोदी को भारतीय जनता पार्टी का पर्याय बनाया गया यह बात भी मोदी के प्रचार अभियान में दिखाई पड़ती है। पहले भाजपा का नारा था-टाइम फॉर चेंज, टाइम फॉर बीजेपी लेकिन जब नरेंद्र मोदी को प्रधान मंत्री पद का उम्मीदवार तय कर दिया गया तो नारा दिया गया टाइम फॉर चेंज, टाइम फॉर मोदी।
मोदी ने अपने चुनाव अभियान में एक तरफ सीधे मतदाता को संबोधित किया तो दूसरी तरफ खुद को एक देशभक्त, राष्ट्रवादी और विकास पुरुष के रूप में प्रचारित किया। उनके नारे थे-वोट फॉर नेशन, वोट फॉर मोदी, आई वांट माई नेशन मोदीफाइड, वन नेशन वन लीडर, तुम मेरा साथ दो मैं तुम्हें विकास दूंगा, विकास को जन आंदोलन में परिवर्तित करना पड़ेगा और येस वी कैन, येस वी विल। नरेंद्र मोदी ने खुद को लोगों ने कनेक्ट करने के लिए खुद को आम आदमी बताया। उन्होंने कहा, मैं गुजरात का सीएम 7 जनवरी 2001 को नहीं बना। मैं हमेशा से ही सीएम हूं। मैं आज भी सीएम हूं और हमेशा सीएम रहूंगा। सीएम का अर्थ मुख्यमंत्री नहीं बल्कि कॉमन मैन यानि आम आदमी है। मतदाताओं को मोदी का यह अंदाज खूब पसंद आया। इस अंदाज के साथ साथ मोदी के चुनाव अभियान में नारों और संदेशों के अलावा मतदाताओं के बीच मोदी के चित्र वाली टीशर्ट, कैप्स, स्टिकर्स जैसी चीजें भी खूब दिखाई दीं, जिन्होंने मोदी को घर घर पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। यही नहीं, मोदी के चुनाव प्रचार में खाने का भी भरपूर इस्तेमाल किया। देश के कई हिस्सों में, ढाबों और रेस्तराओं में नमो थाली-एक खास भगवा रंग के रायते के साथ लज्जतदार थाली ,परोसी गयी। कई स्थानों पर कमल जलेबी यानी कमल के आकार की जलेबी, ऐसी चपातियां जिन पर लिखा था, अबकी बार मोदी सरकार परोसी गयीं। चुनाव प्रचार का यह अनोखा तरीका पहली बार देखा गया।
डिजिटल चुनाव अभियान
नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार से यह भी सीखा जा सकता है कि चुनावों में किस तरह तकनीक का इस्तेमाल करके कोई व्यक्ति कॉमन मैन से ब्रान्ड बन सकता है। नरेन्द्र मोदी ने चुनाव अभियान को डिजिटल बनाने में भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने अपने प्रचार के लिए 10 अधिकृत वेबसाइट्स तैयार करवाईं, वर्चुअल रियलिटी पर आधारित 1350 थ्री डी इनोवेटिव रैलियां कीं, सोशल मीडिया, ट्विटर, यूट्यूब, फेसबुक और एसएमएस का भरपूर इस्तेमाल किया। इसने मोदी को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने की सुविधा दी। यह भी संभवतः पहला ऐसा मौका था, जिसमें चुनाव अभियान का डिजिटलाइजेशन देखने को मिला। यही वजह है कि 45 फीसदी लोगों ने सोशल मीडिया पर राजनीति की चर्चा की। वास्तव में किसी भी चुनाव अभियान में अधिकतम लोगों तक पहुंचना होता है और भारत जैसे विशाल देश में तो यह बहुत ही मुश्किल होता है। लेकिन नरेंद्र मोदी ने अपने चुनाव अभियान के दौरान लगभग 25 करोड़ लोगों से प्रत्यक्ष रूप से और शेष लोगों से अप्रत्यक्ष रूप से सम्पर्क और संवाद कायम किया। और यह सब डिजिटल चुनाव अभियान के कारण ही संभव हुआ।
लेकिन कोई भी चुनाव अभियान केवल तकनीक के सहारे सफल नहीं हो सकता। भावनात्मक रूप से लोगों से जुड़ाव ही किसी भी चुनाव अभियान की सफलता का आधार हो सकता है। नरेंद्र मोदी ने भावनात्मक रूप से लोगों से जुड़ने के लिए ही अपने चुनाव अभियान की शुरूआत 26 मार्च 2014 को मां वैष्णो देवी के आशीर्वाद के साथ जम्मू से की और समापन मंगल पांडे की जन्म भूमि बलिया में किया। इतना व्यापक और व्यवस्थित चुनाव प्रचार लोगों को पहली बार देखने को मिला और पहली बार किसी उम्मीदवार ने इतने लोगों से संपर्क और संवाद स्थापित किया। यह भी सच है कि नरेंद्र मोदी ने राजनीतिक संपर्कों और संवाद की नयी नयी इबारतें लिखीं।
नमो ब्रान्ड का उदय
2014 के लोकसभा चुनावों में पहली बार भाजपा को 282 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत मिला, जो स्पष्टतः मोदी का ही करिश्मा था। भारतीय चुनाव इतिहास में यह पहला अवसर था, जब किसी ऐसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिला था जो कांग्रेस के गर्भ से पैदा नहीं हुई थी। राजनीतिक मार्केटिंग विशेषज्ञ यह मानते हैं कि मोदी की जीत 16 मई को वोटों की गिनती के समय सुनिश्चित नहीं हुई थी, बल्कि 2012 में जब नरेंद्र मोदी गुजरात के तीसरी बार मुख्यमंत्री बने थे, तभी तय हो गयी थी। उसी समय मोदी के लिए प्रधानमंत्री का मंच तैयार कर दिया था। गुजरात के विधानसभा चुनावों में मोदी ने खुद को एक ब्रान्ड के रूप में पेश किया। किसी भी दूसरे राजनीतिज्ञों के लिए यह बात हजम करना कठिन था कि कोई इस तरह खुद को ब्रान्ड बना सकता है। मीडिया से जु़ड़े लोग, पत्रकार और बौद्धिकों ने भी एक राजनीतिज्ञ को ब्रान्ड के रूप में पेश करने के विषय में कभी नहीं सोचा था। लेकिन नरेंद्र मोदी ने खुद को ब्रान्ड बनाया, गुजरात में हुए औद्योगिक विकास का ब्रान्ड एम्बेसेडर। मोदी ने विकास को एक ब्रान्ड के रूप में पेश किया, जिसका वाहक वह खुद बने।
विपक्षी पार्टियाँ मोदी को 2002 के गुजरात दंगों के खलनायक के रूप में प्रचारित करती रहीं। लेकिन मोदी बेहद खामोशी से अपनी चालें चलते रहें। कोई इस बात से वाकिफ नहीं था कि कितनी तेजी से नरेंद्र मोदी मीडिया की सुर्खियां बटोर रहे हैं-पक्ष में या विपक्ष में। राजनीति मार्केटिंग विशेषज्ञ हमेशा से यह मानते हैं कि प्रचार लोगों के जेहन में अपनी जगह बना ही लेता है- बिना इस बात की प्रवाह किये कि प्रचार सकारात्मक है या नकारात्मक। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जहां दोहरी भूमिका निभा रहा था, वह मोदी के समर्थन में और विरुद्ध दोनों स्तरों पर प्रचार कर रहा था। लेकिन सोशल मीडिया में नरेंद्र मोदी की खास रुचि थी। वह जानते थे कि विभिन्न नेटवर्किंग साइट्स का इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है। मोदी की यह सोच औसत राजनीतिज्ञों से अलग सोच थी और मोदी जानते थे कि उनकी यही सोच उन्हें भीड़ से अलग बनाती है।
मोदी की एक खासियत यह भी रही है कि वह हमेशा ही युवाओं के विचारों से प्रभावित होते रहे हैं। कुछ समय पहले उन्होंने श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में जब व्याख्यान दिया था, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि युवाओं के विषय में वह हमेशा यही सोचते हैं कि किसी तरह उनका इस्तेमाल सकारात्मक रूप से किया जा सकता है। यहीं मोदी ने कहा स्वराज के बाद अब सुराज की जरूरत है। तब से लगातार मोदी बेहतर भारत के अपने विजन को लोगों के साथ शेयर करते रहे। अनेक मौकों पर उन्होंने गुजरात के विकास मॉडल पर भी चर्चा की। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मोदी के साथ गिरगिट की तरह व्यवहार करता रहा, लेकिन उसे अन्ततः यह समझ में आ गया कि अरविंद केजरीवाल के मुकाबले बेहतर टीआरपी बटोरने वाला एकमात्र नेता नरेंद्र मोदी ही है। संयोग से 2012 में गूगल प्लस हैंगआउट लॉन्च हुआ। यह भारतीयों के बीच बहुत ज्यादा लोकप्रिय नहीं था, लेकिन अप्रवासी भारतीयांं में इसकी लोकप्रियता थी। कम्प्यूटर, लैपटॉप, एंड्रॉयड, एप्पल डिवाइस पर काम करने वाले गूगल प्लस हैंगआउट के जरिये लोगों से बातचीत कर सकते हैं, ऑडियो-वीडियो, फोटोग्राफ्स शेयर कर सकते हैं।
नरेंद्र मोदी ने गूगल प्लस हैंगआउट का इस्तेमाल अप्रवासी भारतीयों से जुड़ने के लिए किया। इसमें उन्हें बड़ी भारी सफलता मिली। तब तक भारत में कोई अन्य पार्टी इसके विषय में सोच भी नहीं पा रही थी। बाद में 8 अप्रैल 2013 में, ‘मिनिमम गर्वमेंट, मैक्सिम गर्वनेंस’ पर मोदी द्वारा दिए भाषण को नेटवर्क 18 ने गूगल प्लस हैंगआउट के जरिये लोगों तक पहुंचाया। यहां सोशल मीडिया के प्रति मोदी का प्रेम एक बार फिर जाहिर हुआ। मोदी जानते थे कि किस तरह सोशल मीडिया और तकनालॉजी का इस्तेमाल प्रचार अभियान में किया जा सकता है। मोदी ने इन चुनावां में पहली बार डिज़िटल प्रचार किया। प्रचार के लिए बने ‘अबकी बार मोदी सरकार’ जैसे विज्ञापनों को दिखाए जाने का समय भी बहुत अहम था। टेलीविजन पर इन विज्ञापनों को टी-20 वर्ल्ड के दौरान दिखाया गया। इन एनीमेटिड विज्ञापनों में भरपूर ह्यूमर था। इसकी टैगलाइन बाद में बेहद लोकप्रिय हुई।
सम्भवतः नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया का जितना इस्तेमाल किया, उतना इस्तेमाल कोई बहुराष्ट्रीय कम्पनी भी अपने उत्पाद को प्रचारित करने के लिए नहीं करती। उन्होंने माइक्रो ब्लॉगिंग साइट ट्विटर का सर्वाधिक इस्तेमाल किया, इस पर चालीस लाख से अधिक लोग इनके फॉलोअर थे। गौरतलब है कि भारत में ट्विटर का इस्तेमाल करने वालां की संख्या लगभग एक करोड़ पैंतीस लाख है और इनकी उम्र 15 वर्ष से ज्यादा है। मोदी की आवाज में रिकॉर्डिड मैसेज, ‘हर हर मोदी घर घर मोदी’ को दूरस्थ गांवों में पहुंचाया गया। चाय पर चर्चा के दौरान मोदी ने विकास और देश की तरक्की के बारे में चर्चा की। चाय पर चर्चा में शामिल होने वाले लोगों में अनपढ़ या बेहद कम पढ़े-लिखे लोग शामिल हुए। यह भी सम्भव है कि इनमें से बहुतों की रूचि नरेंद्र मोदी को सुनने में ना रही हो, लेकिन इसने एक माहौल बनाया। आते-जाते लोगों ने देखा कि किस तरह प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार चाय पर लोगों के साथ चर्चा कर रहा है।
नरेंद्र मोदी देश के युवाओं को अच्छी तरह समझते हैं। वे जानते हैं कि देश का युवा क्या चाहता है, उसके सपने और आकांक्षाएं क्या हैं, वे कौन से मुद्दे हैं जो युवाओं को आकर्षित करते हैं। नरेंद्र मोदी ने अपने एजेंडे में युवाओं को अहम प्राथमिकता दी। मोदी यह भी जानते हैं कि फैशन युवाओं की जरूरत है, इसलिए चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने अपने स्टाइल का खास ध्यान रखा। आधी आस्तीन का रंगीन मोदी कुर्ता, आँखों को भाने वाले तरह-तरह के जैकेट और उन पर प्रतीकात्मक रूप से कमल के फूल का लोगो युवाओं के लिए फैशन स्टेटमेंट बन गया।
जब कोई कम्पनी अपने किसी उत्पाद के लिए रणनीति तय करती है तो वह यह भी देखती है कि इसी तरह के उत्पादों के लिए दूसरी कम्पनियों की क्या रणनीति है। नरेंद्र मोदी के मुकाबले कांग्रेस की रणनीति बेहद कमजोर साबित हुई और नरेंद्र मोदी भारत का सबसे बड़ा ब्रान्ड बन गये।
नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार का जो रास्ता राजनीतिक पार्टियों को दिखाया है, उस पर चले बिना अब किसी पार्टी का गुजारा नहीं है। 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा जहां 2014 के अभियान के आधार पर अपनी चुनावी रणनीतियां तय करेंगी, वहीं कांग्रेस इस अभियान की काट के लिए इससे बड़ा अभियान सोचेगी।

राजनीति, कारोबार और सोशल मीडिया का दुरूपयोग

सोचिये संसार की कई कम्पनियों ने अपनी वेब साईट से फेसबुक ओर इन्स्टाग्राम पेज हटा दिए हैंI आखिर क्यों?
 
कैम्ब्रिज एनालिटिका क्या है?:: यह राजनीतिक जनसंपर्क का काम करेवाली एक कम्पनी है जो ब्रिटेन से काम करती है उनके कार्यालय वाशिंगटन और न्यूयॉर्क में भी हैंI अपनी वेब साईट पर खुद कैम्ब्रिज एनालिटिका ने बताया है कि वह राजनेताओं के रणनीतिक उपयोग के लिए लोगों के बारे में डाटा संग्रह करके मतदाताओं का मन बदलने तथा नेताओं को जिताने की योजनायें बनाने का काम करती है I यह कम्पनी सिर्फ फेसबुक से देता नहीं लेती बल्कि दुनिया भर की मार्केटिंग, रीयल एस्टेट, ट्रेवेल और पोर्नोग्राफी साइट्स से भी देता इकट्ठा करती हैI
 
डेटा माइनिंग :: इस तरह से इकट्ठा जानकारियाँ जिनका उपयोग किसी भी तरह से चुनाव, बाज़ार, मुनाफे, खरीदारी या जासूसी के लिए किया जा सके उसे डेटा माइनिंग, यानी जरूरी सूचनाएं खोदकर निकालना कहते हैं I
 
डेटा ब्रोकरेज :: आंकड़ों की दलाली या खरीद फरोख्त, इसी कड़ी का महत्वपूर्ण हिस्सा है I ये ‘डेटा प्रोस्टिट्यूशन’ या जानकारियों की वेश्यावृत्ति भी कहलाता हैI मतलब ये कि आपसे सम्बन्धित जानकारियों को बाज़ार में कोई भी जब चाहे जैसे चाहे खरीद सकता है और उनके साथ जो चाहे कर सकता हैI
कैम्ब्रिज एनालिटिका का गुनाह क्या है?:: मतदान जैसी निष्पक्ष प्रक्रिया को पूरी दुनिया में राजनेताओं की काली कमाई और डेटा प्रोस्टीट्यूशन की बदौलत प्रभावित करना I नतीजे हैं किसी एक पार्टी की निरंतर और अप्रत्याशित जीत और किसी पार्टी का मुकम्मल सफाया I व्यापारिक अनुबंध के रूप में आप सभी प्रत्येक सोशल मीडिया को आपसे जुडी सारी सूचनाओं, चित्रों, पोस्ट्स तथा अन्य कंटेंट का जब चाहे उन्योग करने की इजाजत देते हैंI उन सोशल साइटों से कैम्ब्रिज एनालिटिका जानकारियों को खरीद कर जहाँ चाहें उपयोग करती और ज़्यादा रुपया कमाती है I
 
गुनाह और अपराध का मुद्दा :: एक जगह कैम्ब्रिज एनालिटिका से चूक हुई है वह है सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से हम लोगों के प्रोफाइल की जानकारी की खुदाई करना या उसे बेचने का हक़ हासिल करनाI उसके पास इस काम का कोई अधिकार नहीं हैI प्रोफाइल्स की जानकारियों के आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर राजनीतिक पार्टियां वोटरों को प्रभावित करने की रणनीति बनाती हैंI जैसे अब मूर्तियाँ तोड़ने के प्रायोजित नाटक भी इसी तरह से कराये जा रहे हैं जैसे हिन्दू मुस्लिम मानसिकता को दूहने की कोशिशें I फेसबुक ने मार्क जुकरबर्ग की माफी के बाद इस मामले को अभेद्य तो बना दिया है मगर कब तक ये नहीं बताया जा सकता I
फेसबुक की गलती क्या?:: विश्वविख्यात अखबार Telegraph के अनुसार फेसबुक को दो साल पहले लगभग पांच करोड़ यूजर्स के संवेदनशील डेटा की चोरी की आशंका से अवगत कराया गया था I माना जाता है कि कुछ लोगों ने इस जानकारी की गंभीरता से मार्क जुकरबर्ग को अवगत नहीं कराया I  इसके बाद 2011 में यूरोपीय नियामक संगठनों ने चेताया कि सॉफ्टवेयर डवलपर्स  भी डेटा प्रोस्टीट्यूशन के काम में लगे हैं तो फेसबुक ने उपभोक्ताओं को सरसरी सूचना देने के कुछ बदलाव लागू किये I वर्ष 2013 में केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अलेक्सांद्र कोगन ने कहा कि फेसबुक के निचले स्तर के अफसरों ने इस मामले पर चार साल तक काबू करने की कोशिश नहीं की I
हद तो यह हुई कि 2014 से फेसबुक लगातार नित नयी एप्प्स को यूजर्स के प्रोफाइल और जानकारियों के प्रयोग की इजाजत देती आयी है और दे रही हैI
ज़करबर्ग का माफीनामा :: फेसबुक के संस्थापक मार्क ज़करबर्ग  ने सार्वजनिक माफीनामे में कहा है (हिंदी रूपांतरण) “यह विश्वासघात था और मुझे खेद है कि हमने इस बारे में समय से कुछ ज्यादा नहीं कर पाएI” 
गलतियां और गलतियाँ ::  कैम्ब्रिज एनालिटिका ने आम इंसान की जानकारियों को दूहा और उनको मतदान की लोकतांत्रिक प्रक्रिया और मतदाताओं का मिजाज़ एवं मानसिकता बदलनेवाली राजनीतिक गतिविधियों (साजिशों) के लिए इस्तेमाल किया I यह सूचना इतनी लापरवाही से बांटीं जा रहीं थीं कि बाज़ार में इस करतूत की पोलपट्टी खुल गयी I संसार की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं को दिए गए एक पृष्ठ के विज्ञापन में फेसबुक ने इस मामले में माफी भी माँगी I 
निष्कर्ष :: पहले  फेसबुक ने एप्प्स को लोगों के आंकड़े कुरेदने, खोदने और उनसे नतीजे निकालने की छूट दी और फिर इसी जानकारी को उन  कम्पनियों द्वारा उपभोक्ताओं के खिलाफ इस्तेमाल होने या बेचे जाने पर कोई रोकथाम नहीं की I कैम्ब्रिज एनालिटिका ने  इन आंकड़ों और जानकारियों के आधार पर अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव को मनमर्जी दिशा में मोड़ने का काम कियाI  वैश्विक बाज़ार पर कब्जा करने में सोशल मीडिया के उपयोग पर अपनी किताब अपराइजिंग  में स्कॉट गिब्सन ने इस बारे में बेहद रोचक टिप्पणी की है ” उपभोक्ताओं को याद रखना चाहिए कि यदि वह किसी भी व्यापार की सुविधा का मुफ्त उपयोग कर रहे हैं, तो वह खुद भी उसी बाज़ार का बिकाऊ माल हैं!” 

 

The PR Cold Wars : Strategies and Mechanism

The political bosses in India, now altering and ‘selling’ the distorted images of their opponents, thanks to the PR Cold Wars. The unsuspecting voters don’t even realize this image engineering and the new warfare of the customized ideological battles

Definition: The PR Cold War is a state of conflict between two different interest groups that does not involve direct propaganda but it’s pursued primarily through indirect publicity measures and the dark propaganda. In this type of a Cold War instead of weapons, PR twists and altered content is used against the targeted party or people. You may call it Dark PR or PR Voodoo!

Scope: Once Rahul Gandhi alleged that an army of the publicists work day and night to target his image. And everybody laughed. Even the Congress didn’t took it as a PR challenge. Factually PR Cold War is a PR mission in which a political party targets its opponents, using all sorts of verbal and non verbal publicity resources. Many of the leaders have not even heard about it. A PR Cold War basically aims at tarnishing the image of competitor in a s subtle way without being noticed by others.

Mechanism: Everyone wants to get benefited from the relations, particularly the politics is developing, maintaining and using relationships only. The politicians keep trying non stop to build their credibility and the best thing, naturally their opponents want to do naturally is downsizing them. The whole exercise now becoming popular all over the world among the politicians. Due to various reasons the professionals don’t do it openly and they neither bill it this way. The PR industry uses many strategies such as maligning image (s), stripping personalities socially to make them unacceptable and creating a horrible image of the targeted person using all sorts of engineered content. that mask the truth and uncover the massive shit around.

Not Irreparable: The Dark PR is the best loved strategic PR tool. It hardly gives the targeted opponent any chances of gathering the courage to stand up early and admit, “Yes, this much fault is mine, and now I want to set things right. I promise you that haven’t disguised the truth in any manner.” Professionally the Dark PR fallout is not deadly, it may never ruin anyone’s image and reputation forever. Handled carefully the bounce back is better than ever.

Principles : Make opponents’ life miserable, in whatever manner. Like CIA’s Chief J. Edgar Hoover instructed his agents, ” If you don’t have much to do, just keep urinating on the enemy camp. At least it will smell foul from both the sides and make their life miserable.” This is the commonest principles the PR Cold War is based upon. Smart publicists keep ‘urinating’ on their opponents to make them appear smell foul socially without any logic. This is actually a process of destroying someone’s reputation and identity to the extent it is irreparable. It’s paying attention on harming your opponents’ image instead of maintaining your clients’ positive reputation.

A PR Cold War is a war without any reason. It’s full of professional smear strategies, political espionage, propaganda and information mining because the data is invariably crucial for every PR Cold War Mission.

Reputation Bleeding: The PR Cold War is virtually like any surprise terrorist attack but it never is a suicidal mission, to save the professionals operating it. Its full scale good PR with bad intentions. It’s not like stabbing someone. It’s not like bombing or shooting someone. It’s just giving someone a sharp and minor blade cut and left him bleeding. By the time he tries to recover, give another cut. So, it’s death by reputation bleeding. The PR Cold Wars require a lot of research. This method initially evaluates the PR Security of the target and evolve a set up. It also assess the possible PR threats, vulnerabilities and attack strategies.

Example: Just think. Is it merely by chance that all the Chief Ministers in India who could emerge as third front leaders are being constantly & systematically targeted socially, publicly and personally. On the other hand the ruling party admitting and accepting the controversial leaders without giving a reason, why its ignoring their earlier outbursts and mistakes, they were enjoying & exploiting? The political parties are huge ideological groups but they also have many irresponsible members and officeholders, that serve as the fuel for the disinformation operations. Any mistake they commit is engineered and blown intelligently to bombard the targeted political party.

Strategies: The PR Cold Wars are of several types. Being the indirect types they usually depends on the enemies, mistakes and circumstances that may fuel the disinformation team. Like the Judo, the PR Cold Wars also use the power of the enemy to harm him. Since recently the Telangana Chief Minister KCR has started the discussion on the third front hence he is the primary target these days. I will brief you about the types of PR Cold Wars just by giving the examples of attacks KCR suffered these days.

(i) Tunnel Attack: The tunnel attacks are unilateral attacks in which the propaganda bases on a real fact and distorts it suitably. The defender doesn’t have any chance to say anything first hand, if the PR team is not very proactive. Recently the Telangana Chief Minister KCR just missed a step and fell to the ground while coming out of his chopper. Someone promptly recorded it and posted on the web and instantly it becomes a viral video getting millions of hits and thousands of shares. If you see this video you will realise that after KCR missed a step, he almost instantly bounced up again. If he was not fully in senses, it could haven’t been near possible. In other smaer campaigns the targets are also shown smoking cigarette, dancing in a party, smiling for a selfie with a fan, who actually a planted person with suspected background, handshaking with college girls or wives of some officers and even getting a massage. Some huge bungalow is shown and declared its build using only black money. Such images help create their bad brand image and spoil their reputation.

(ii) PR Landmine: This strategy basically uses such vulnerable circumstances that can easily be mastered the other way. Like when Pakistan’s First Lady Begum Sehba Musharraf with her husband General Parvez Musharraf met at the state dinner in the President house at New Delhi, the ISI deliberately used a particular photograph to malign Indian Prime Minister, after the Agra Summit failed without any outcome. The photograph in question showed PM Bajpai looking at Mrs Sehba in an unusual way while Sehba seems disinterested and not even looking at the unmarried Prime Minister. This matter didn’t flare up as expected because un that photo Mrs Muhrraf seen extending her hand, unusual and unexpected courtesy, while Mr Bajpai not. The looks in his eyes were equated with this gesture. So, this landmine could not blast.

(iii) Content Disinformation : This is the most easy and a favorite Propaganda Method in which the target is either video recorded or photographed very clearly while doing something. Later this content is mastered or doctored to suit the intention. The best example is the way Rahul Gandhi is made a joke using the same trick.

This method is supposed to be very versatile and extremely powerful. The PR machinery usually exploit even scripted opportunities like this one, in which an unsuspected target is harmed beyond easy repair. See video.

The target sometimes recorded using TV or any other media stream and the content is doctored later. A huge team analyzing the procured, edited and doctored content frame by frame. After a day or two this content is edited, filled and touched up with effects and released on unsuspected yet popular handles with purchased following of millions of people all over the world. See this video showing Telangana Chief Minister KCR actually speaking in the assembly and the video showing him fully drunk, by just using slow motion technique, creating a doubt that they spoke in a drunk state.

This content went viral in no time but eventually failed to confuse the Telangana people who have seen KCR speaking in his typical lightening style.  See his original style here.

The PR Trojans? : Borrowed from the story of the wooden horse used to trick the defenders of Troy into sneaking soldiers into their city. The PR Trojan Horse is a PR Mercenary that hides inside the enemy system easily.

In the political PR the most easy PR Trojans are the near retirement officers, the money shark media person and the clerks of the various Secretariats. The needy security personals also serve the same purpose to leak sensitive inputs. There are a wide variety of PR Trojan mercenaries and that’s a complicated discussion. The Trojans are divided into various sub categories and they perform an array of complicated tasks. Sometimes a lower set of Trojans also used to infiltrate, steal the secret data and hire similar Trojans unsuspectingly. For the first time in the history of this country such operations are being carried out on a large scale and practically all the big political parties have multiple sets of Trojans

Yes we are experiencing a state of full fledged PR Cold War in India. KCR is the first casualty and before 2019 many more such timed explosions are ticking. The KCR is one of the apex chief ministers who are trying to evolve a third front before 2019. The other leaders under attack are Niteesh Kumar, Arvind Kejriwal, Naveen Patnaik and Akhilesh Yadav.

Conclusion: The PR Cold War has to be swift and fast. It’s more successful if it works before getting noticed. One example of such a failed attack is the full page advertisement released in all the major newspapers by the ruling political party. The theme was a tree (India) with many branches, with an Owl (representing the Chief Ministers of different states of India)sitting on each branch with this line “Har Shakh Par Ullu Baitha Hai, Anjame Gulistaan Kya Hoga?” Reflecting that most of the chief ministers of that political party are Owls -ruining their respective state. This so harsh usage of phrase caught the attention of every opponent party. And that advertisement boomeranged. Soon another advertisement appeared in every big news paper and channel showing, a tree (India) with many branches, with ONLY one Owl sitting in the middle of the tree (representing the Prime Minister of India), with the following slogan: “Bas Ek Hee Ullu Kaafi Hai Barbad Gulistan Karne Ko.” This counter PR attack nullified the initial immense impact of that campaign much before it could progress ahead..

The present PR Cold War is aimed only at propagating ideologically doctored content to the targeted audiences. Its mechanism is still the most unexplored and rarely studied area of public relations. Its scope is massive, not well understood and far reaching. The opposition is also desperately trying to propagate some twisted facts but has failed to gather any ground despite a few thousand likes. See this video,

No doubts such contents are well produced and interesting but they may serve only as entertainment without transforming anything on ground. There are various important PR lessons that can be learned just by looking at how public relations influenced opinion can affect the mood of the targeted public.This is not a coincidence. India is experiencing it’s existence’s first full fledged PR Cold War. The targets unprepared while their reputation being slaughtered ruthlessly.

मीडिया संपर्क में सावधानियां

मीडिया सम्पर्क की दुनिया में भी अस्तित्व की रक्षा का सिद्धान्त लागू होता है। हर संस्थान में केवल वही मीडियाकर्मी सम्मान पाता है, जो खबरों के मामले में अन्य मीडियाकर्मियों से आगे रहता है। मीडिया सम्पर्क का सबसे बुनियादी सूत्र है कि मीडिया कर्मियों को प्रतिदिन नई खबरें, नई जानकारियाँ और अनोखे तथ्य हर स्थिति में चाहिए। मैंने 40 साल तक देश के प्रमुख राजनेताओं का मीडिया और जनसम्पर्क का कार्य देखा है और मुझे इस बात का एहसास है कि पेड मीडिया के बढ़ते दबदबे के बावजूद आज भी मीडिया में अच्छे लोगों की भरमार है। यदि आप उन्हें यह विश्वास दिला सकें कि आप उनके संस्थान या उनका दुरुपयोग नहीं करना चाहते, तो वे आपकी पूरी मदद करेंगे। यह बात और कि यदि आपके पास विज्ञापन का भरपूर बजट है तब भी मीडिया बहुत खुशी से आपकी मदद करेगा। सच है कि विज्ञापन पर ही मीडिया संस्थानों का जीवन चलता है, मगर उनका अस्तित्व सच्चाई के लिए लड़ने से है। मीडिया संस्थान अपराधियों और झूठों का साथ बहुत अधिक समय तक नहीं दे सकते।
बिकाऊ और फर्जी खबरों के युग में भी मीडिया सम्पर्कों का उतना ही महत्व है, जितना पहले कभी हुआ करता था। आज मीडिया की विश्वसनीयता इतिहास के सबसे न्यूनतम स्तर पर है। यह माना जाता है कि ऐसा संसार के हर एक देश में हो रहा है। मंहगाई के इस दौर में टिके रहने के लिए मीडिया संस्थान भी तरह-तरह के हथकंडे अपनाने पर विवश हो गये हैं। इसके बावजूद मीडिया में निजी सम्पर्कों का महत्व जस का तस बरकरार है। मीडियाकर्मी आज भी अपने समाचार-स्रोत की रक्षा के लिए जान की बाजी लगा दिया करते हैं। राजनेताओं और प्रसिद्ध व्यक्तियों द्वारा जानबूझकर मीडिया को अविश्वसनीय ठहराने के जो प्रयास किये जाते रहे हैं, उनका प्रभाव मीडिया की विश्वसनीयता पर बेशक पड़ा है।
जनसम्पर्क विशेषज्ञों के लिए आज मीडिया में पैठ बनाना एक चिन्ता का विषय है। बहुत से जनसम्पर्क विशेषज्ञ इस कल्पना से ही सिहर जाते हैं कि उन्हें किसी मीडिया संस्थान में लोगों से कोई काम कराना है। उन्हें मालूम ही नहीं होता कि किसी संस्थान में मीडियाकर्मियों से काम निकालने के लिए क्या करना चाहिए? बहुत से जनसम्पर्क विशेषज्ञ अपने यजमान से मीडिया को धन देने के नाम पर अतिरिक्त शुल्क भी वसूलते हैं। वास्तविकता यह है कि बिकाऊ खबरों के दौर में भी अच्छे मीडियाकर्मी ज़िन्दा हैं, ठीक उसी तरह जिस प्रकार समाज में अपराधियों और असमाजिक तत्वों के बावजूद अच्छे नागरिक मौजूद हैं। मीडिया में अच्छाई और बुराई के सन्तुलन को अपने पक्ष में इस्तेमाल करना ही सफल मीडिया सम्पर्क का गुण है।
किसी भी उद्देश्य से किये जा रहे मीडिया सम्पर्क में यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिए कि आप अत्यन्त प्रतिभाशाली और ऐसे सतर्क लोगों से मिल रहे हैं, जो आप जैसे लोगों से हर रोज मिलते हैं। यदि आप एक बार मीडिया सम्पर्क के स्वार्थों को भूलकर अच्छे मीडियाकर्मियों की निकटता हासिल करने का प्रयास करेंगे, तो आपको कभी निराशा नहीं होगी। अपनी हैसियत, कैरियर और सम्मान तक को दांव पर लगाकर लोगों के लिए जान पर खेल जाने वाले लोग मीडिया में कम नहीं हैं। यह बात अलग है कि आप मीडियाकर्मियों को एक बार से अधिक से धोखा नहीं दे सकते। इसलिए मीडिया सम्पर्क में प्राकृतिक रूप से और बिना हड़बड़ी के रिश्तों का विकास करने का प्रयास करना चाहिए।
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में जब मुझे मुख्यमंत्रियों का मीडिया और जनसम्पर्क देखने का पहली बार अवसर मिला तब मैने तीन दिन का समय केवल विभिन्न कार्यालयों में जाकर राजनीतिक संवाददाताओं से मिलने का समय निकाला। अपने कार्यालय से मैं यह सुनिश्चित कर लेता था कि किस समय किस कार्यालय में कौन-सा राजनीतिक संवाददाता उपलब्ध था। यकीन मानिए उनमें से हर एक मुख्यमंत्री और राज्यपाल को व्यक्तिगत रूप से जानने वाला था। उनमें से अधिकांश सत्ता के सबसे बड़े अधिकारियों के निकट मित्र थे। उन्हें अपनी शक्ति का पूरा एहसास था। यही नहीं, उनमें से कई इतने शक्तिवान थे कि उनके एक संकेत पर मुझे सचिवालय से हटाया जा सकता था। इसके बावजूद जब मैं उनसे मिलने गया तब आरम्भिक संकोच और दूरियों के बावजूद उन लोगों ने मुझे पूरा महत्व दिया और सहयोग का आश्वासन भी। इसी कारण मैं उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री के सचिवालय में सूचना विभाग के इतिहास में सर्वाधिक समय तक कार्य करने वाला मीडिया प्रमुख रहा।
उपरोक्त उदाहरण मैने इसलिए दिया है, ताकि मीडिया सम्पर्क की दुनिया में आने वाले नये लोग यह जान सकें कि वे जिस भी मीडिया कार्यालय में जिस भी कार्य से जायेंगे, उनकी मुलाकात ऐसे लोगों से होगी, जिनके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सम्पर्क आपसे हर मायने में बेहतर होंगे। ये लोग अगर आपको एक बार समझना शुरु कर दें, तो किसी कीमत पर आपको ठुकरायेंगे नहीं। मै इस बात को इसलिए भी याद रखता हूँ, क्योंकि जब तीसरी बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी मायावती ने मुझे किसी गलतफहमी के कारण हटाया तो उसके कुछ ही समय बाद मुझे उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री कार्यालय में विशेष कार्याधिकारी के रूप में तीन वेतन मान अधिक देकर नियुक्त कर दिया गया। जबकि मैं उत्तराखण्ड की राजनीति में किसी को नहीं जानता था। बहुत बाद में मुझे पता चला कि तत्कालीन मुख्यमंत्री डाॅ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ को लखनऊ के कुछ पत्रकारों ने फोन करके मेरे बारे में प्रशंसा की थी। डाॅ. निशंक के हटने पर उनके प्रतिद्वंद्वी जनरल खंडूरी ने भी पत्रकारों की राय पर मुझे अपने साथ बनाये रखा और दिल्ली का भी अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया। जनरल खंडूरी के हटने पर उनके स्थान पर मुख्यमंत्री बने कांग्रेस के नेता विजय बहुगुणा ने भी पत्रकारों के परामर्श पर मुझे दिल्ली के कार्य से हटाकर देहरादून से सम्बद्ध रखा और मेरे लिखित आग्रह पर भी बहुत कठिनाई से मुझे उत्तर प्रदेश के लिए कार्यमुक्त किया।
मीडिया से सम्बन्ध बनाना कोई आसान कार्य भी नहीं है। ऐसा तो हरगिज़ नहीं होता कि आप पहली बार किसी मीडिया कार्यालय में चले जायें और वहां आपका कोई मित्र बन जाये। हमेशा याद रखिएगा कि प्रभावशाली और महत्वपूर्ण मीडियाकर्मियों से मुलाकात करने के लिए आपका विज़िटिंग कार्ड ही काफी नहीं होगा। सम्भव है आपको एक-दो बार उनसे मिलने का प्रयास करना पड़े। अधिकांश व्यस्त पत्रकार सुबह 11 बजे के आस-पास अपने कार्यालय में दैनिक बैठक के लिए आते हैं। उनसे मिलने के लिए यह समय हरगिज़ सही नहीं है। वे दिनभर के कार्यक्रमों के लिए दौड़़-भाग में लगने वाले होते हैं। ऐसे में किसी से बात करना उनकी प्राथमिकता नहीं होती। उचित होगा कि आप दैनिक बैठक के बाद उस कार्यालय में उपलब्ध ब्यूरो प्रमुख अथवा समाचार सम्पादक से भेंट करें। अपनी प्रथम भेंट वार्ता में आप क्या कहेंगे, इस पर आपके भावी सम्बन्ध निर्भर करेंगे।
किसी भी मीडिया घराने के प्रमुखों का एक कार्य होता है, अपने प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले बेहतर कवरेज को बढ़ावा देना। यदि आप इसकी तैयारी करके जायेंगे और उन्हें बताएंगे कि हाल ही में उनके संस्थान के कौन से कार्यक्रम आपको अधिक प्रभावशाली लगे और किन कार्यक्रमों में आपको व्यक्तिगत तौर पर कुछ कमी नज़र आयी, तो आपको पहली ही बार में भरपूर महत्व मिलेगा। लेकिन यह तरीका सम्बन्धित मीडियाकर्मी से मिलते समय काम नहीं आयेगा। उनसे मिलते समय आपको यह ध्यान होना चाहिए कि हाल ही में उनके द्वारा किन कवरेज में कमाल किया गया है। आप उनकी प्रस्तुति और उस कार्यक्रम में इस्तेमाल खास जुमलांे की सराहना कर सकते हैं। इसके बाद आप स्वाभाविक तौर पर उनके काफी नज़दीक आ जायेंगे। पहली मुलाकात के बाद दूसरी मुलाकात की शीघ्रता न करें। उचित होगा कि आप उस मीडियाकर्मी को व्हाट्सएप, ई-मेल और एसएमएस के उपयोग से यदा-कदा उनकी स्टोरीज़ पर प्रतिक्रियाएं भेजते रहें। सुबह-शाम गुडमाॅर्निंग और गुड ईवनिंग के सन्देश हरगिज़ मत भेजिएगा। यदि पहली ही मुलाकात में किसी तरह से आप उस मीडियाकर्मी का ई-मेल और सोशल मीडिया एकाउंट जानने में सफल हो जाते हैं, तो इससे बेहतर कुछ नहीं है। आप उसी दिन उस मीडियाकर्मी को सोशल मीडिया पर फाॅलो करना शुरु कर दीजिए। उसकी महत्वपूर्ण पोस्ट पर लाइक्स और टिप्पणियाँ भी कीजिए। यह टिप्पणियाँ केवल इमोटीकाॅन नहीं होनी चाहिए। मीडियाकर्मियों से निकट सम्बन्ध बनाने के लिए उनकी पोस्ट पर एक शब्द लिखना कभी भी अच्छे नतीजे नहीं देगा। आपको उस पोस्ट को पूरा पढ़कर कम से कम तीन चार पंक्तियाँ लिखनी होंगी। धीरे-धीरे आप उस मीडियाकर्मी के अधिक निकट आ सकते हैं। उनसे जब चाहे तब मिल सकते हैं। सोशल मीडिया के उपयोग से आपको यह भी पता चल जायेगा कि उस मीडियाकर्मी का जन्म दिन कब है और विवाह की वर्षगांठ कब है। इससे आप एक कदम आगे बढ़ा सकते हैं। उसे व्यक्तिगत बधाई और उपहार देने का अवसर निकाल सकते हैं। यह उपहार बहुत मंहगा नहीं होना चाहिए।
यदि आप किसी व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए मीडिया का उपयोग करना चाहते हैं, तो आपको निश्चित ही विज्ञापन पर आधारित प्रायोजित मीडिया कवरेज पर निर्भर होना पड़ेगा। मीडिया स्वभावतः किसी व्यवसायिक गतिविधि को बिना अपने संस्थान का लाभ सुनिश्चित किये बढ़ावा नहीं देता। इसके अपवाद केवल वही कार्यक्रम होते हैं, जो आयोजित तो व्यवसायिक उद्देश्यों के लिए किये जाते हैं, परन्तु जिनका स्वरूप सार्वजनिक होता है। ऐसे कार्यक्रमों को मीडिया आमतौर पर नज़र अंदाज़ नहीं करता। अनेक मामलों में तो मीडिया ऐसे कार्यक्रमों को प्रस्तुत करने में साझीदार भी बनने में संकोच नहीं करता। इस प्रकार के सह प्रायोजनों के नियम और शर्तें आयोजक आपस में मिलकर तय कर लेते हैं। सामान्यतः मीडिया इस प्रकार के आयोजनों में साझीदारी का कोई भुगतान नहीं करता, अपितु उसकी एवज में उस आयोजन का निःशुल्क विज्ञापन और कवरेज मीडिया पार्टनर के रूप में कर देता है।
राजनीतिक जनसम्पर्क की दुनिया में मीडिया के साथ समीकरण कुछ अलग ही प्रकार के होते हैं। राजनीतिक जनसम्पर्क दो तरह का हो सकता है। एक तो जब आप सत्ता में हों और आपके पास मीडिया सम्पर्क कार्य के लिए सरकारी मशीनरी तथा विज्ञापन का बजट भी हो। दूसरा तब जब आप चुनाव लड़ रहे हों और आप पर निर्वाचन आयोग द्वारा लागू आचार संहिता की बन्दिशें हों। पहली स्थिति में राजनीतिक जनसम्पर्क का कार्य कुछ आसान होता है, क्योंकि आपके पास मीडिया सम्पर्क से जुड़े कार्य करने वाली मशीनरी होती है। प्रतिभावान लोगों की टीम होती है। जिनका आप उपयोग कर सकते हैं। चुनावों की घोषणा हो जाने के बाद आप सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल खुल कर नहीं कर सकते। देश भर के सत्तारूढ़ दल चुनावों के दौरान कार्यवाही होने से बचने के लिए अपनी पार्टी के स्रोतों का ही इस्तेमाल करते हैं।
यदि आप सत्ता में नहीं हैं, तब आपके पास काम करने की अधिक सुविधा है। राजनीतिक जनसम्पर्क से जुड़े अधिकांश लोग यह मानते हैं कि मीडिया सत्तारूढ़ दल को अधिक महत्व देता है। इसमें कुछ सच्चाई भी है। इसका कारण यह भी है कि तमाम तरह की सरकारी सुविधाओं का प्रचलन होने के कारण मीडिया की सरकारी तन्त्र पर कुछ अधिक निर्भरता होती है। यह निर्भरता मीडिया को अधिक बांध कर नहीं रख पाती। आपने स्वयं ध्यान दिया होगा कि सरकारी तन्त्र की अति सक्रियता के बावजूद रोज ही मीडिया में प्रतिपक्षी राजनेताओं के बयान, भाषण, रैलियाँ, प्रतिक्रियाएँ और आरोप-प्रत्यारोप नज़र आते रहते हैं। इसका बुनियादी कारण यह है कि मीडिया के सभी ग्राहक सत्तारूढ़ दल को ही पसन्द नहीं करते। आर्थिक मज़बूरियों के बावजूद मीडिया को अपने प्रसार और टीआरपी का भी ध्यान रखना होता है। यदि कोई मीडिया आर्थिक लालच में आकर केवल एक तरफा खबरों का प्रसारण-प्रकाशन करेगा, तो अपनी साख खो देगा। लोग उसे छोड़कर किसी दूसरे समाचार माध्यम को अपना लेगें। यही सन्तुलन लोकतन्त्र का सौंदर्य है।
जनसम्पर्क के पेशे में अपने यजमान को समाचारों में महत्व दिलाना बहुत ज़रूरी माना जाता है। मीडिया संस्थानों में प्रतिदिन विज्ञापनों के दबाव और समाचारों की भरमार के कारण यह कार्य अनायास नहीं हो सकता। आपको अपना समाचार ही इस प्रकार से तैयार करना पड़ेगा कि वह समाचार सम्पादक की जानकारी मेें ज़रूर आये। उस समाचार का प्रकाशन सम्भव है कि एक बार न हो, दूसरी बार उसी समाचार को नये सिरे से बनाकर भेजने पर भी यदि महत्व न मिले, तो समझ लीजिए आपके उस संस्थान में सम्पर्क बन नहीं पाये हैं। इस स्थिति से निपटने का एक ही उपाय है कि उस समाचार को सोशल मीडिया के सभी प्लेटफाॅर्म पर पोस्ट किया जाये। यदि आपके समाचार में दम है, तो एक ही दिन में वह हजारों लोगों तक पहुँच जायेगा। मीडिया भी उसे महत्व देगा। अन्यथा आप अगले मौके की प्रतीक्षा और अपने समाचार लेखन की कला में सुधार कीजिए।
यह कभी नहीं भूलिएगा कि मीडियाकर्मियों की सत्तारूढ़ दल से निकटता उनकी पहचान नहीं होती। मीडियाकर्मियों को उनकी चैंकानेवाली, अनोखी और सनसनीखेज खबरों के लिए समाज में सम्मान मिलता है। मीडियाकर्मी भी हम लोगों की तरह ही सामाजिक प्राणी होते हैं। वे पक्ष पात करके अपने सम्मान को दांव पर नहीं लगा सकते। व्यक्तिगत तौर पर मीडियाकर्मी इतने प्रखर होते हैं कि किसी राजनेता के बारे में प्रतिकूल समाचार प्राप्त होने पर सीधे उसी से प्रतिक्रिया मांगने का साहस रखते हैं। आप इसको उनका पक्षपात मान सकते हैं कि आरोप प्रत्यारोप की कहानी के साथ प्रभावित पक्ष की कहानी को भी वह अपने कवरेज में स्थान देते हैं। पत्रकारिता के मापदण्डों में इसे पक्षपात नहीं अपितु निष्पक्षता कहा जाता है।
राजनीतिक जनसम्पर्क में समाचार माध्यमों में छाये रहने के लिए मीडिया के उपयोग में अनेक सावधानियाँ बरतना आपको सदा मदद देता है। फोटोग्राफर से लेकर कैमरामैन तक और संवाददाता से लेकर सम्पादक तक, आपके लिए सभी सम्मानीय और महत्वपूर्ण होने चाहिएं। आपका उनके साथ व्यवहार, औपचारिक और शिष्ट तो हो, परन्तु किसी भी स्थिति में नकली नहीं होना चाहिए। यह हमेशा याद रखिएगा कि मीडिया में सभी लोग एक जैसे नहीं होते, ठीक उसी तरह जिस प्रकार समाज में सभी एक जैसे नहीं होते। यदि आप मीडिया सम्पर्क प्रोफेशनल हैं, तो आप सभी मीडियाकर्मियों से सम्पर्क बनाने का प्रयास अवश्य करें, परन्तु यह कभी न भूलें कि कुछ मीडियाकर्मियों की प्रकृति मेें मैत्रियाँ निभाने का स्वभाव नहीं होता। ऐसे लोगों की वजह से मीडिया के बारे में कोई व्यक्तिगत धारणा न बनायें और हताश भी न हों। मीडिया सम्पर्क का सबसे आसान सूत्र है, यह ध्यान रखना कि आपके क्षेत्र में सर्वाधिक महत्वपूर्ण मीडिया संस्थान कौन से हैं? उन संस्थानों में कौन लोग आपके क्षेत्र से सम्बन्धित कार्य देखते हैं? उन लोगों से निकट सम्पर्क बनाने में सफलता ही सफल मीडिया सम्पर्क की पहचान है। यह कार्य अलग-अलग किस्म के प्रोफेशनल्स् विभिन्न प्रकार से करते हैं। मीडिया सम्पर्क की दुनिया लिखित सिद्धान्तों पर काम नहीं करती। यह आपके व्यवहार और लोगों को अपना बनाने की कला पर निर्भर करती है। मीडिया के लोगों को आमतौर पर सत्तारूढ़ दल के निकट माना जाता है, जबकि स्थिति इसके उलट ही है। मीडिया को रोज ऐसी खबरें चाहिए, जिन्हें जनता पसन्द करे। जनता उन्हीं खबरों को पसन्द करती है, जो जनहित के मुद्दों से जुड़ी होती है। सत्तारूढ़ दल के पास ऐसी खबरें रोज तो हो नहीं सकती। कोई भी दल कितना भी लोकप्रिय क्यों न हो उससे 40 प्रतिशत लोग हमेशा नाराज़ ही रहते हैं। उस दल के विरोधी दल भी हुआ करते हैं। उनके पास भी बहुत से आरोप और सवाल हुआ करते हैं। मीडिया अच्छी तरह जानता है कि लोकतन्त्र की उठापटक में कब कौन-सा दल सत्ता पा जायेगा, यह तय करना उसके हाथ में नहीं है। जनता को मीडिया अपनी प्राथमिकताओं की लाठी से हांकने की कोशिश तो ज़रूर करता है, परन्तु जन समर्थन की हवा को भांपते ही सबसे पहले पाला बदलने वाला मीडिया ही होता है। इसके बावजूद मीडिया का एक वर्ग अपने आर्थिक हितों की विवशता के बावजूद राजनीतिक प्रतिबद्धता के कारण सदा ही सत्ता के विरुद्ध नज़र आता है। अब यह आपके ऊपर है कि बेहतर मीडिया सम्पर्क के लिए आप कौन-सा रास्ता चुनना पसन्द करेंगे।
बदलते दौर में सोशल मीडिया बहुत तेजी से प्रिंट और इलैक्ट्राॅनिक माध्यमों को हड़पता जा रहा है। अपनी मीडिया सम्पर्क रणनीतियाँ बनाते समय इस तथ्य का ध्यान रखना, आपकी हमेशा सहायता करेगा। यह कभी मत भूलिएगा कि प्रिंट और इलैक्ट्राॅनिक समाचार माध्यमों के भी आॅनलाइन संस्करणों का अस्तित्व भी केवल इसलिए है कि लोग अब इंटरनेट पर अधिक निर्भर हो गये हैं। भविष्य में जब मीडिया सम्पर्क के लिए आप अपने कार्यालय से कदम बाहर निकालें, तब आपका व्यवहार आपकी शक्ति होना चाहिए। आपका विज्ञापन बजट आपका सहयोगी होना चाहिए और आपका कन्टेन्ट आपका आत्मविश्वास बना रहना चाहिए। मीडिया सम्पर्क में पहला शब्द मीडिया है। दूसरा शब्द सम्पर्क है। जाहिर है मीडिया बिना कन्टेन्ट के कुछ भी नहीं है। बिना कन्टेन्ट के मीडिया से सम्पर्क नामुमकिन है।

Reversing Career Destinies

Hiroshima-Nagasaki were destroyed by atomic bombs yet Japan recovered. The Congress party was practically rooted out of Indian Politics yet it bounced back. Donald Trump was declared the most unlikely and hated candidate yet he became the U.S. President. What makes such successes happen? Is it the destiny or doing what you can? Can we reverse the career disasters we experienced or apparently heading towards?

Karmic Theory of Destiny: Apart from authoring a variety of nonfiction bestsellers, I have also authored many astrology and fortune telling books as well. So, I am pretty aware of this fact that there is no such thing as inevitable destiny. Have you noticed several astrologers and numerologists often suggest their clients to wear gem stones, perform certain rites and even suggest to alter the names of the people, products and places. Why? To alter, affect or avert destined disasters? It means, the destined outcome can be altered, tailored or changed all together.

According to the Karmic Theory of Destiny our future depends on what we did in our past lives and what we do in this life.

In this equation the Prarabdha is your past life karma and the karma is what you do or try to do in this life. Cancelling the past life and this life expressions, we get only Karma, that means our destiny depends only on what we think, try to do and eventually do in our life time. Some ancient discourses argue that since Prarabdha can not be changed hence there is no meaning of what we do because ultimately we get rewards and punishments as per our past life karma.

Ancient Hindu scripture, The Bhagavad Gita (bhagavad-gītā), often referred to as simply the Gita, is basically the only religious work that teaches a lot about how not to be afraid in life. The Gita is available in all the languages throughout the world. Basically it is a part of the Hindu epic Mahabharata (chapters 23–40 of the 6th book). The Gita is 700 Sanskrit verses, in the form of dialogue between Lord Krishna and his friend Arjuna.

Perform & Outperform : Every careerist must get inspiration from the Gita because the Lord Krishna tells, ” It’s not those who lack energy or refrain from action but only thosewho keep working without expecting any reward, achieve greater and better goals in life. Nothing can harm such people. Not even the destiny.” It is obvious from this teaching that the God Almighty only favors constantly working people. Further Lord Krishna elaborates, ” Do everything you have to do, but not with greed, not with ego, not with lust, not with envy but with love, compassion and devotion to what you see as the purpose of your life. And you will find that your failures will become your strengths and make you invincible.” Here it’s taught that one who improves his working by learning from the failures, eventually attains better victories and never fails again.

The Power of Karma: Lord Krishna explains how Karma yoga, i.e. performance of prescribed duties, but without attachment to results, is the appropriate course of action. In the next chapter he reveals that the knowledge has no Religion. He elaborates further that the one and only God favors those, who keep performing their duties and their is nothing better than doing your duties only. Anybody may improve ones life by doing what is best to do in given circumstances without finding an excuse to forgo action, because doing what you may do is superior, because it may even alter your destiny. The Gita may inspire any struggling job seeker. It teaches us that the virtue of our actions is incredibly faster and it really works three times faster. The Karma or doing your best is very important because the God really protects his children who have faith in him and has surrendered to him. This surrender is not at all doing nothing but in fact it’s doing what best you may contribute towards your life struggle. Lastly the Gita says, ” When you keep performing your duties sincerity and forget what might be the outcome of your good actions, then the almighty takes command and gives you the best.”

So, if you think your career is drowning and you don’t see any help around, instead of cursing the bad luck you must try harder and in a better manner to get help. Your such endeavors will keep you not only alive but also help you reversing your career destiny.

Reversing Career Disasters : Like Dietetics and the Cancers, I think the Career Disasters are also of several types.

The Zero Stage: The zero stage of a career disaster is being jobless. You have the desire and some qualification also but no career. You waiting a lot. Tried a lot. Applied a lot. Yet no job.

The Impending Doom : The first stage career disaster is that you have a job but things are rapidly becoming out of hand at the works place and either you feel like quitting it or being kicked out soon.

The Career Rot : This is a more serious thing. You feel ignored and sidelined at the work place and feel like being forced to either quit or suffer more humiliation. This will require better efforts and re-engineering your career options.

The Expired Career : You served your tenure and now leading a retired life. Still want to do a lot but no options coming your way. Your career is seemingly dead, despite your capabilities, experience and potential.

For all the situations mentioned above, there are some established strategies to re engineer career disasters.

Strategies of Reversing Career Disasters :

Reversing Career Disasters is actually learning the steps to achieving your career priorities in a given situation. You must clearly know that which stage of career disaster you are suffering? After this assessment try to apply the success principles to the given situation.

Find Yourself : The first remedy is to decide what you want to do? Remember, its NOT what you want to become, what you should be, what salary you should get and what your employer should do for you. It’s just what you want to do? What is your specialization? What best you may do? What you may do easily? What purpose you have in life? If you value freedom, purpose or power or than doing anything, then you should first correct your thinking. Nobody will give you any job to help you realize your fantasies. Better write down who you want to become and follow that exercise up with the skills you’ll need to learn in order to be that person. You will easily be something in sometime when you start (remember Karma here) being it. Its not easy but finding your past mistakes and without getting frustrated just eliminate those faults without ever repeating them. This small change will eventually accelerate your career progress. Throughout life keep this improvement system working- Trying, Failing, Re-Organizing, Removing Faults, and Repeating what you learned!

Big Failures lead to Big SuccessThroughout the history of mankind and the civilizations we find a lot of hugely successful people in life who failed multiple times but became successful because they never gave up. They faced the problems without fear and ultimately they won.

Like I already referred the Gita above, the Life is only hard work & patience. The greatest scientist of all times Albert Einstein failed 104 times, before he was noticed. The world famous Walt Disney failed 302 times before pioneering his legendary cartoon characters and the Disneyland. The Harry Potter series author JK Rowling failed 12 times but never gave up. She finally decided to focus on writing and became a multi-billionaire authoring legend. Facebook founder Mark Elliot Zuckerberg was initially an average American computer programmer and Internet entrepreneur and failed 11 times before establishing his globally social networking website.

Similarly India’s corporate giant, Dhiru Bhai Ambani was also an ordinary man and worked on daily wages earlier as a teenager. When he started his first cotton trading business, he was hardly able to dream of a bigger plan. Despite suffering several conspiracies, he never ever gave up and established on of the all time biggest business empire in India. His sons also duplicated his success and made his the Reliance Group of companies into a business dinosaur. Likewise the father of Indian industrial revolution JRD Tata, Steel King Lakshmi Mittal, Kumar Mangalam Birla, an incredibly successful Chairman of Aditya Birla Group, Sunil Bharti Mittal, the world famous Indian telecom mogul, Ronnie Screwvala the founder chairman of UTV Group, Dr Ashok Chauhan the founder Chairman of AMITY Group of Universities and institutions and Gautam Adani, the Chairman of Adani Group, all of these turned rags into riches. In every field we find that those who made a mark in life, did actually failed many a times before getting any big success.  

So whenever you see a red signal and start seeing danger ahead, immediately pay attention and gather all your guts and gears, try to control the situation the best way. Don’t shy taking help from others. Stay calm. Get focused and try to find a solution. If you screwed up, don’t make excuses, instead just sincerely apologize for any misstep, miscommunication or oversight on your part. Don’t let a small mistake linger and turn into a bigger one. If you know you did something wrong, deal with it right away. In any moment of decision, the best thing you can do is the right thing, the next thing is the wrong thing, and the worst thing you can do is nothing.

Plan Your Moves: If you want to succeed then you must first of all you must know what job skills are in demand and paying. If you don’t have them, manage your free time and acquire some of the in-demand skills taking part time courses. Never get disheartened by finding that you don’t possess eve 50% of the required skills. Jut make a mental note, what is easy to learn and how? Find an online course, book, or inquire at your nearest college to attain more education, skill or expertise.

The freshers should do research and find out what exactly they are able to do without any experience? They should read a lot online and try to ask help from their working seniors. Remember such networking invariably helps in education, career and job hunting. When I was studying in University, I made it my routine to everyday visit the library, canteen and staff room to meet and greet my colleagues, seniors and teachers. It helped me a lot. Without asking for help I got all sorts of assistance.

The truth is, we all face difficult situations at work but not everyone knows how to handle them. Often people let mistakes and crises cripple — even paralyze — them, but bouncing back from roadblocks in your career is not as daunting as you might think. I really believe that every crisis is an opportunity; most errors are reversible, so it’s important to remember that how you try to bounce back out of career disasters. In any moment of decision, the best thing you can do is the right thing, the next thing is the wrong thing, and the worst thing you can do is nothing. So, keep doing right things it will never fail you. Never ever over analyze an error, reliving the mistake over and over. It’s important to step back and take a overview of the situation and its long-term effects. After evaluating the scenario, consult some good professional and take a stand.

Never forget everyone loves to hear comeback, survival and revival stories. Be one. Nearly every successful person has failed at something before making it big. What you learn from failure helps you identify new ways of doing things and allows you to grow and become a better manager and leader.

Futher readings

  1. https://www.managementtoday.co.uk/recover-career-disaster/your-career/article/1425272
  2. http://blog.aftercollege.com/3-ways-to-reverse-your-summer-internship-disaster/
  1. http://www.wisebread.com/11-famous-failures-that-led-to-success-and-the-lessons-they-teach

Banking Affairs and Developing Corporate Leaderships

No bank may survive without Corporate Support. The growing market oriented economy, digitization, globalization, liberalization, privatization, 24X7 efficiency and glocal model is rapidly transforming Corporate Governance in the banking system. In the banking sector the most followed Corporate Governance Structure has already collapsed everywhere but India is still following the obsolete style that has no in build capacity to develop the Corporate Leaders. As a results many banks facing the ultimate survival threat: a total collapse..

The Banking is not at all only monetary affairs. Fundamentally it’s dealing with the specific publics who trust a bank for safekeeping their financial assets and getting them back wherever and whenever they need. No doubt the banks play a very important role in the economic life of a country. If we wish to strengthen our economy, we will have to manage our banks very efficiently. Thus the soundness of any banking system depends on the corporate participants who are supposed to be accountable for the various performances. Hence the Corporate Governance of the banks cannot be ignored.

Since the Corporate Governance is an internal mechanism in the banks, it’s held absolutely responsible for building the image, reputation, confidence and long term relationships with the customers and all sorts of stakeholders apart from the normal banking operations. As a Public Relations Management Professional I feel that the baking system should also upgrade its Corporate Governance by developing the corporate leadership within the system in such a manner that may transform the entire work culture to suit the rapidly changing banking style of the society. Currently 83% of the banking staff is unaware of the ongoing and the future corporate challenges that may adversely hit most of the banks if they fail to upgrade.

Unfortunately most of our banks operate in such a traditional and obsolete manner that is of no use to the clients. What they consider important in the Corporate Governance is only related to their Boards, their Committees, the concerning Boards and Official Meetings, their legal disclosure and transparency, etc.

Despite 24X7 available online transactions, funds transfers, ATM operations and global existence hardly any bank have developed a system to regularly help, trouble shoot, assist, monitor or organize interaction with the clients. The banking staff also suffer this mismanagement as clients.

The baking system understands only the company laws and the corporate handbooks in this matter. They follow only what is mandated. They don’t try to reform unless there is some written instruction, although no banking law force them NOT to develop the Corporate Leaderships as an internal practice.

No bank may survive without Corporate Support. The growing market oriented economy, digitization, globalization, liberalization, privatization, 24X7 efficiency and glocal model is rapidly transforming Corporate Governance in the banking system. In the banking sector the most followed Corporate Governance Structure has already collapsed everywhere but India is still following the obsolete style that has no in build capacity to develop the Corporate Leaders. As a results many banks facing the ultimate survival threat: a total collapse..

It’s an established fact that no bank may survive without good Corporate Governance at all. Without functional transparency, client oriented operations, collective sensibility and accountability towards every stakeholder, no bank may attain the market confidence. And without this confidence no bank would ever grow.

The Corporate Governance not only include the structures, processes, cultures and systems that engender the successful operation of organizations but the public relations as well. The bankers must understand that the banking systems are not just their staff, rule books, passbooks, check books, ATM, offices, promotions, advertisements and the hi-fi location & appearance of the building. It’s much more than this. It’s the way banking staff behaves, superiors behave and connect to all sorts of the big and small clients.

It’s practically impossible to make a bank more successful by just changing its structure. Beyond doubt a poor corporate leadership may eventually lead to bank failure. It may result into disastrous & irreparable consequences impacting the deposits and reputation. It may cause credibility collapse and remarkable loss of clients’ confidence. No bank can reemerge from such disaster.

Control : We may easily develop a better corporate leadership by adopting region specific corporate and public relations strategies and setting clear cut time bound objectives for every member of the team. Such arrangements should be incentive based and communicated throughout the banking organization so that every contributing member know the responsibilities and the rewards. Every member should know their role in this exercise and the supervising officers must know and cross check, how a particular team is performing or lagging behind others.

Every bank has specific ethical values, objectives, strategy and control environment. The management should clearly understand, what is required from the which team. Such efforts should not only be focused to achieve and maintain the public and corporate confidence in the banking system, but also within the fabric of the bank. Any bank may not sail long with a poor corporate leadership, which could inevitably trigger a major bank run or liquidity crisis.

Without proper training, timely updates, rewards and incentives to the best performers, the structuring a strategic plan to attain the desired goals within a time frame is impossible. Without clearly designated, briefed and rehearsed roles and powers of the participating members, no bank may keep standing as a winner.

Therefore, the foremost requirement of developing a good corporate leadership hierarchy for the banks, is the clear identification of powers, roles, responsibilities and accountability of everyone. These roles and responsibilities should be invariably well documented. Every participant member of the bank should be encouraged to take independent judgment.

Building Mega Credibility, The Supersonic Way

th28-city-pandi_28_2130540g

Recently I read an article that highlighted the importance of the appearance of the sales staff in strengthening the mega-credibility of a product or a company. I have a very different view about this. Its NOT at all that your sales persons’ personal credibility is the key to attain and maintain mega-credibility but some other elements, factors, practices and strategies do play a great part in it.  Remember that each day the global markets witness almost 250, 000 products and brands launched and 90% of them vanishing without a trace. It’s the credibility that destroy the biggest names in a fraction of seconds. Yet, several prominent names still command the mammoth credibility, which is coined as mega credibility.   The big question today is this How to Build A Mega Credibility?

Brick by Brick : Everyone knows that the word “credibility” is originated from a Latin word “credo,” that means “my faith”. If we consider it as solid as a brick, then the mega credibility of the organization must be the sum total of all such brick solid credibility systematically aligned together. No less then that. Several small yet significant measures may build up any credibility by just adding different values to it.

Towards Mega Credibility : The factors that determine the magnitude and size of your credibility are several but I am mentioning only a few of them.

  1. Character : Its not only the character of your staff but also the DNA of your company policies towards various customer, after sales, brand loyalty and quality related issues that work like the foundation of your mega-credibility. Even before anyone starts using your product or services they try to investigate or know more about your organization or credibility. If more people consider you a responsible person then your success is almost assured.
  2. Quality : If your quality is ultimate and yet your pricing very modest then it would definitely better the brand credibility. Similarly if the behavior of your sales, after sales, services, marketing and supply teams is also a class in itself, then no one is going to stop you from attaining a mega credibility.   Although the overall quality of the company is very important, but its also crucial to maintain the mark.
  3. Communication :Every organization or individual willing to attain a mega-credibility, should first learn how to propagate the positive feedback and achievements in market. One must be extremely careful while highlighting any material that may affect its credibility. A slight slip or a little sub standard stuff shall invariably better your competitors only.
  4. Elevation_1
    Omaxe the Palace Lucknow

    Interaction : Remember that its not communication or customer care. It doesn’t have any relations with that. Its the modus operandi how your organization or you interact with your clients, work force, suppliers, vendors and the publics. If they have 24X7 access to the concerning authorized people then only it will transform your credibility in the right direction.

  5. Transparency: If your publics are not able to see how do you do, then they will never accept you as open and honest. Any unwanted secrecy about what is well known about the process and procedures adapted by your competitors will harm you beyond repairs. Your credibility would suffer serious credibility smashing missiles. The best way to deal with such disasters is a timely self-disclosure propaganda.Credibility Package: No organization should ever try to grease or hurt, please or annoy or oppose & favor any sorts of non professional & irrelevant ideologies. Your company logo, stationary and advertising endeavors should never overlook these issues. Your work force should get such an uniform that suits every caste & creed. Such measures tell a lot about you or your organization.
    Place Monge Line 8 Metro Station
    Place Monge Line 8 Metro Station

    Conclusion : Every organization or individual interested in attaining mega credibility status should exhibit pure professionalism & absolute control over personal emotions. Your products should not use any such languages or packaging as well. Try to stick to your organizational or personal goals only. Stay out of controversies. Always. If ever you or your company fall into it, reemerge ASAP. Those who are interested in mega credibility should respect the deadlines and keep delivering high-quality work without causing delays in the delivery.

    Solutions : Every organization serves some type of the specific publics and its very easy to transform the available expertise in any setup into an aura of credibility ambassadors. I may help the interested organizations in this matter, if they may spare two days time.

    (The author doesn’t own the illustrations used here)

शहंशाही गाली कला

akbar1शहंशाह अकबर के ज़माने की बात है ।

अकबर के नवरत्नों में से एक थे अब्दुल मोमिन । उनके बहुत ज्यादा प्याज खाने की वजह से शहंशाह अकबर ने उनको ‘मुल्ला दो प्याजा‘ का खिताब दे डाला था।

मुल्ला के रहन सहन और शौकों बारे में बहुत अजीब अजीब और अश्लील बातें कही जातीं थीं। कोई उनके किसी ‘ख़ास’ शौक को लेकर उनको ‘जनाना’ कहता तो कोई उनको चुगलखोर चापलूस । शहंशाह हुमायूं के वक्त हिन्दुस्तान आया, मुल्ला हिन्दुओं से बेहद नफरत करता था। अकबर के हिन्दुओं से संबंधों के कारण मुल्ला अपनी नफरत को बहुत जाहिर नहीं करता था । लेकिन मौक़ा पड़ते ही वह बीरबल को किसी ना किसी अपमानजनक परिस्थिति में फंसाने में लगा रहता था ।

बादशाह के ख़ास मनसबदारों और दरबारियों की किसी महफ़िल में एक मौके पर मुल्ला दो प्याजा द्वारा हिन्दुओं को कायर और घटिया कहे जाने पर एक राजपूत सेनापति पृथीपाल (असली नाम पृथ्वीपाल होगा) ने मुल्ला की तुलना सूअर से कर दी ।

मुल्ला भी अकबर के कम चहेते ना थे I वह शिकायत लेकर अकबर के सामने पेश हुए I Mulla-do-piazza(1)

चतुर अकबर ने इसे हिन्दू-मुस्लिम विवाद मानकर राजा मानसिंह से सलाह लेनी चाही । उन्होंने समझदारी दिखाते हुए कहा कि राजा टोडरमल को क़ानून की ज्यादा जानकारी है । राजा टोडरमल भी कन्नी काट गए। उन्होंने कहा कि राजा बीरबल से बेमिसाल राय मिलेगी । राजा बीरबल की भी मुल्ला से नहीं बनती थी। कई दरबारी तो यह सोच कर खुश थे कि अब बीरबल फंस ही गया ।

अकबर से बीरबल ने पूछा “जहाँपनाह, राय दूं, या फैसला ?”

अकबर भी समझता था कि बीरबल सार्वजनिक तौर पर नाइंसाफी तो कर ही नहीं पायेंगा । उसने कहा, आपका कहा हमारा हुक्म माना जाएगा । उस पर बेशक अमल होगा । अगर खुद हमको नामुनासिब लगा तब ही हम दखल करेंगे ।तब आपको सज़ा मिलेगी बीरबल ।

बीरबल ने मुक़दमे की कार्रवाई शुरू की । पूछा ” मुल्ला हुज़ूर फरमाइए पृथीपाल ने कितना नशा कर रखा था?”

गुस्से में भन्नाए मुल्ला ने बिना सोचे कहा, ” कम से कम दस प्याले !”

“ मुल्ला हुज़ूर को फ़ौरन से पेश्तर दस प्याले शाही अंगूरी पेश की जाए ।” बीरबल ने ऐलान किया ।

अकबर ने सहमति में सर हिलाया, मगर पूछा “ यह हुक्म क्यों बीरबल?”

बीरबल बोला, “क़ानून है खून का बदला खून । इसलिए नशे में गाली का बदला नशे में गाली दिलवा कर दिया जाएगा” ।

birbal-leadशाही अंगूरी मुल्ला के सामने पेश की गयी । बीरबल ने मुल्ला से पूछा, “ मियां हुज़ूर, आपको यकीन है कि दस प्याले के बाद आप सिर्फ पृथीपाल को ही गालियाँ देंगे ? क्योंकि आप इजलास में हैं और अगर आपने एक लफ्ज भी पृथीपाल के बजे किसी और को कह दिया तो आपको बादशाह हुज़ूर से सामने बेअदबी की बहुत कड़ी सज़ा मिलेगी ।“

दबी जुबान में मिमियाते हुए मुल्ला ने पूछा, “राजा बीरबल, मैं इनको मुआफ करता हूँ ।“

बीरबल ने मुल्ला से फिर पूछा, “ मुल्ला ये फरमाइए कि आप शाही अंगूरी के दस प्याले पीने से क्यों बाख रहे हैं ? क्या आपको ये लगता है कि मदहोशी के आलम में आप शहंशाह को औल-फौल कह सकते हैं?”

मुल्ला दो प्याज़ा ने कहा , “नशा तो नशा है !”

बीरबल ने ऐलानिया कहा, “जिल्लेसुभानी जो इंसान मदहोशी में हुज़ूर की शान में भी गुस्ताखी कर सकता है, उसे पृथीपाल ने जो कहा वो कम है क्या ?”

अकबर मुस्कुराया और बोला, सब लोग गौर फरमाएं  “राजा बीरबल ने शाही इजलास में मुंसिफ के बतौर अच्छा काम किया और ये दिखाया कि होशमंदी रखी जाए तो किसी को कानून की हदों में रह कर भी गाली दी जा सकती है ।

बाद में शहंशाह अकबर ने मुल्ला दो प्याजा को आगरा से दूर लाहौर का किलेदार (गवर्नर) बना कर भेजने का हुक्म  भी जारी कर दिया । मुल्ला  को किसी ने आगरा और फतेहपुर सीकरी में दोबारा नहीं देखा ।

 

 

Cross Functional Relations Management

Begin Well, Keep Slow : You are paid to deliver results using any type of stuff you have. Its YOUR skill how fast and how efficiently you achieve it. And managing results through cross-functional influences is like a child’s play. If you know its basics. Initially it may appear very difficult but with some practice you will be able to learn that its similar to constructing meaningful words out of useless alphabets. Like joining building blocks to make the desired shapes.

Evolving YOUR Strategy :  Watch a three year old making very simple words by picking up or sorting out the required plastic alphabets scattered nearby. What the kids usually do? During their kindergarten ages they sort out all the alphabets in a particular manner mostly assorting all similar alphabets together. In management this grouping often helps you to identify who is capable of doing what and what is their availability?  So out of a horrible pile you have to identify and select the elements that might be useful and then try organize them in a more complex manner. After some practice It becomes like solving a crossword puzzle. Another step ahead towards almost assured success.

Complex Decisions : Every manager must steer across cross functional
diversities very carefully simply by not using useless alphabets and picking up the ones that make sense. While you require to produce results you must do this modestly without hurting anyone, because they might be of some use in some other cross-functional scenario.

Handling Cross-Functionalism : If you would ever watch a toddler struggle with the apparently nonsensical building blocks to make a detailed project, just observe how the game proceeds ahead? You would notice that initially that kid try to copy the plan printed on the box or illustrated in the booklet. At any juncture when he or she comes short of blocks he try to place some other units to better the shape.  Hardly any kid leaves the game play and  approach seniors to ask for assistance. Reason being he or she enjoys leading and taking decisions.

img2

NO Powers, Yes Empower : With the transformation of the global business scenario the role of a singular expert is out and the teamwork is in. The new way of management is shedding fruitless hierarchy to stop wasting time in getting  green signals and trusting fluid collaboration. The cross functional identities are useless if we waste time nursing their superiors’ ego. The new way is to pick up better leaders among the cross functional teams and assign them specific jobs using  empowerment. It Saves Time. Saves Effort. Betters Results. Wastes nothing. The reports and feedback also remain very useful. Vertical hierarchical structures are also replaced by network organizations, adaptive organizations, informal organizations and horizontal organizations. The company’s cross-functional teams of chosen internal leaders move quickly and adapt to any assignments in a better manner. No passing the buck. Management researchers have concluded that NOT leaders but the teams deliver better , faster. The new management strategy is using diverse teams of the sub ordinate management strata and their work force representing different areas of functions. The only thing that is kept in mind is their workable relationships, to avoid the failures due to lack of coordination and understanding. Its not essential that you take a group of friends because they like to remain together. The effective cross functional coordinators may easily select some members who might be totally strangers even. There are a number of possibilities here, you will have to consider as required.

Emerging Cross Functional Culture : The diversity of the cross functional team players gradually evolves into a new result oriented culture. Recently my daughter’s six year old son demanded some characters from his favorite animated cartoon movie Angry Birds. I tried to understand that basically he needed some similar toys. So I proposed that if you help me then I try to make the toys which are not available in India. And this way we made a micro size team. Both of us not knowing anything about making handmade toys. Yet, he meticulously advised me to initially make the toys from papers and then we graduated to card board toys. We kept on making one toy after the other and within three days we made about a dozen animated characters and toy vehicles. Thus, by creating a cross-functional team, we transform a potentially very powerful possibility into some great results. This way of functioning cuts short many time wasting formalities and weave an unimaginable cross-functional design of diverse unexplored talents.

img3Leadership Challenges: The leadership of a cross-functional team is complex and very difficult. The team leader must be capable of understanding both the subject and the contributions made by people from a wide variety of backgrounds. He must have the human resources management skills to facilitate the interactions of his team. Apart from these traits the cross functional leader must know about the assignment well. He should be capable of encouraging  participation, conflict resolution and consensus building. He must be able to work without using any  authority. Additionally if such team leader is capable of adapting faster and working in a more organized manner, then it would definitely be an added advantage.

img4

Getting Results : The core value of this cross functional idea is exploiting the potential of the inter personal relations of any diverse group of carefully chosen people to manage a project, launch a program, control the production, redesign some obsolete system, develop and solve any sets of problems. This is like some children playing together, enjoying the company and creating something that gives them pleasure. In cross functional matrix  any success is not at all individual but a team success, all rewards become team rewards, and if at all the team fails, they start afresh to win without getting disheartened. In cross functional management a clear team goal is invariably the most important thing that is very clearly explained to everyone. The team leader remains directly responsible to gain the commitment of the team and trains them. The group creates their own policies and procedures to systematize the functioning.

Advantages : There are many advantages of effective cross-functional teams. First is the speed, all cross-functional teams work faster as I elaborated earlier because the process reduce the time it takes to get things done, especially during the product development process. Secondly the cross-functional teams improve any organization’s ability to solve complex problems. These teams help the organizations satisfying the customer’s needs. They increase the creative capacity of the organizations. These teams almost effortlessly develop new skills rapidly. The cross-functional management strategies promote more effective teamwork and saves a lot of money that can be used later in welfare activities.

img5

Disadvantages : It sounds good in theory, but if the participating team is not properly raised or managed it may fail miserably in the field, later. There are some secondary strategies to control this situation but this management strategy is solely dependent on what sort of majority you have in your company.

(The author doesn’t claim any right over the illustrations used in this write up)