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राजनीति, कारोबार और सोशल मीडिया का दुरूपयोग

सोचिये संसार की कई कम्पनियों ने अपनी वेब साईट से फेसबुक ओर इन्स्टाग्राम पेज हटा दिए हैंI आखिर क्यों?
 
कैम्ब्रिज एनालिटिका क्या है?:: यह राजनीतिक जनसंपर्क का काम करेवाली एक कम्पनी है जो ब्रिटेन से काम करती है उनके कार्यालय वाशिंगटन और न्यूयॉर्क में भी हैंI अपनी वेब साईट पर खुद कैम्ब्रिज एनालिटिका ने बताया है कि वह राजनेताओं के रणनीतिक उपयोग के लिए लोगों के बारे में डाटा संग्रह करके मतदाताओं का मन बदलने तथा नेताओं को जिताने की योजनायें बनाने का काम करती है I यह कम्पनी सिर्फ फेसबुक से देता नहीं लेती बल्कि दुनिया भर की मार्केटिंग, रीयल एस्टेट, ट्रेवेल और पोर्नोग्राफी साइट्स से भी देता इकट्ठा करती हैI
 
डेटा माइनिंग :: इस तरह से इकट्ठा जानकारियाँ जिनका उपयोग किसी भी तरह से चुनाव, बाज़ार, मुनाफे, खरीदारी या जासूसी के लिए किया जा सके उसे डेटा माइनिंग, यानी जरूरी सूचनाएं खोदकर निकालना कहते हैं I
 
डेटा ब्रोकरेज :: आंकड़ों की दलाली या खरीद फरोख्त, इसी कड़ी का महत्वपूर्ण हिस्सा है I ये ‘डेटा प्रोस्टिट्यूशन’ या जानकारियों की वेश्यावृत्ति भी कहलाता हैI मतलब ये कि आपसे सम्बन्धित जानकारियों को बाज़ार में कोई भी जब चाहे जैसे चाहे खरीद सकता है और उनके साथ जो चाहे कर सकता हैI
कैम्ब्रिज एनालिटिका का गुनाह क्या है?:: मतदान जैसी निष्पक्ष प्रक्रिया को पूरी दुनिया में राजनेताओं की काली कमाई और डेटा प्रोस्टीट्यूशन की बदौलत प्रभावित करना I नतीजे हैं किसी एक पार्टी की निरंतर और अप्रत्याशित जीत और किसी पार्टी का मुकम्मल सफाया I व्यापारिक अनुबंध के रूप में आप सभी प्रत्येक सोशल मीडिया को आपसे जुडी सारी सूचनाओं, चित्रों, पोस्ट्स तथा अन्य कंटेंट का जब चाहे उन्योग करने की इजाजत देते हैंI उन सोशल साइटों से कैम्ब्रिज एनालिटिका जानकारियों को खरीद कर जहाँ चाहें उपयोग करती और ज़्यादा रुपया कमाती है I
 
गुनाह और अपराध का मुद्दा :: एक जगह कैम्ब्रिज एनालिटिका से चूक हुई है वह है सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से हम लोगों के प्रोफाइल की जानकारी की खुदाई करना या उसे बेचने का हक़ हासिल करनाI उसके पास इस काम का कोई अधिकार नहीं हैI प्रोफाइल्स की जानकारियों के आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर राजनीतिक पार्टियां वोटरों को प्रभावित करने की रणनीति बनाती हैंI जैसे अब मूर्तियाँ तोड़ने के प्रायोजित नाटक भी इसी तरह से कराये जा रहे हैं जैसे हिन्दू मुस्लिम मानसिकता को दूहने की कोशिशें I फेसबुक ने मार्क जुकरबर्ग की माफी के बाद इस मामले को अभेद्य तो बना दिया है मगर कब तक ये नहीं बताया जा सकता I
फेसबुक की गलती क्या?:: विश्वविख्यात अखबार Telegraph के अनुसार फेसबुक को दो साल पहले लगभग पांच करोड़ यूजर्स के संवेदनशील डेटा की चोरी की आशंका से अवगत कराया गया था I माना जाता है कि कुछ लोगों ने इस जानकारी की गंभीरता से मार्क जुकरबर्ग को अवगत नहीं कराया I  इसके बाद 2011 में यूरोपीय नियामक संगठनों ने चेताया कि सॉफ्टवेयर डवलपर्स  भी डेटा प्रोस्टीट्यूशन के काम में लगे हैं तो फेसबुक ने उपभोक्ताओं को सरसरी सूचना देने के कुछ बदलाव लागू किये I वर्ष 2013 में केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अलेक्सांद्र कोगन ने कहा कि फेसबुक के निचले स्तर के अफसरों ने इस मामले पर चार साल तक काबू करने की कोशिश नहीं की I
हद तो यह हुई कि 2014 से फेसबुक लगातार नित नयी एप्प्स को यूजर्स के प्रोफाइल और जानकारियों के प्रयोग की इजाजत देती आयी है और दे रही हैI
ज़करबर्ग का माफीनामा :: फेसबुक के संस्थापक मार्क ज़करबर्ग  ने सार्वजनिक माफीनामे में कहा है (हिंदी रूपांतरण) “यह विश्वासघात था और मुझे खेद है कि हमने इस बारे में समय से कुछ ज्यादा नहीं कर पाएI” 
गलतियां और गलतियाँ ::  कैम्ब्रिज एनालिटिका ने आम इंसान की जानकारियों को दूहा और उनको मतदान की लोकतांत्रिक प्रक्रिया और मतदाताओं का मिजाज़ एवं मानसिकता बदलनेवाली राजनीतिक गतिविधियों (साजिशों) के लिए इस्तेमाल किया I यह सूचना इतनी लापरवाही से बांटीं जा रहीं थीं कि बाज़ार में इस करतूत की पोलपट्टी खुल गयी I संसार की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं को दिए गए एक पृष्ठ के विज्ञापन में फेसबुक ने इस मामले में माफी भी माँगी I 
निष्कर्ष :: पहले  फेसबुक ने एप्प्स को लोगों के आंकड़े कुरेदने, खोदने और उनसे नतीजे निकालने की छूट दी और फिर इसी जानकारी को उन  कम्पनियों द्वारा उपभोक्ताओं के खिलाफ इस्तेमाल होने या बेचे जाने पर कोई रोकथाम नहीं की I कैम्ब्रिज एनालिटिका ने  इन आंकड़ों और जानकारियों के आधार पर अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव को मनमर्जी दिशा में मोड़ने का काम कियाI  वैश्विक बाज़ार पर कब्जा करने में सोशल मीडिया के उपयोग पर अपनी किताब अपराइजिंग  में स्कॉट गिब्सन ने इस बारे में बेहद रोचक टिप्पणी की है ” उपभोक्ताओं को याद रखना चाहिए कि यदि वह किसी भी व्यापार की सुविधा का मुफ्त उपयोग कर रहे हैं, तो वह खुद भी उसी बाज़ार का बिकाऊ माल हैं!” 

 

अकादमिक प्रतिष्ठा की रक्षा के उपाय

आतंकी संगठनों के बदले हुए एजेंडे, पडौसी देशों के बीच शीत युद्ध और आतंकी गुटों के भरती अभियानों को मनवांछित समर्थन ना मिलने के कारण उन्होंने अब अकादमिक संस्थानों को सीधे निशाना बनाना शुरू कर दिया है ।  पुराने समय से ही सियासी साजिशों को युवा शक्ति बहुत भाती है। सत्ताधारियों में ये होड़ चली आयी है किसके पास अधिक गुंडे, दबंग और युवा शक्ति होगी। युवाओं और छात्रों में अनुभव नहीं होता। एकता जबरदस्त होती है। वे मित्रों का अनुसरण करते हैं । एक को बहकालो तो उसके मित्रों की नेटवर्किंग से सबको उकसाना,  बरगलाना आसान है । वे बिना सवाल पूछे अनुकरण किया करते हैं । जल्दी ही मानवता के इतिहास का सबसे खतरनाक दौर शुरू हो सकता है, जिसमें हथियारों को थामने वाले हाथ भी आपके बच्चों के होंगे और उनका निशाना भी वे खुद ही होंगे ।

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