Building Mega Credibility, The Supersonic Way


Recently I read an article that highlighted the importance of the appearance of the sales staff in strengthening the mega-credibility of a product or a company. I have a very different view about this. Its NOT at all that your sales persons’ personal credibility is the key to attain and maintain mega-credibility but some other elements, factors, practices and strategies do play a great part in it.  Remember that each day the global markets witness almost 250, 000 products and brands launched and 90% of them vanishing without a trace. It’s the credibility that destroy the biggest names in a fraction of seconds. Yet, several prominent names still command the mammoth credibility, which is coined as mega credibility.   The big question today is this How to Build A Mega Credibility?

Brick by Brick : Everyone knows that the word “credibility” is originated from a Latin word “credo,” that means “my faith”. If we consider it as solid as a brick, then the mega credibility of the organization must be the sum total of all such brick solid credibility systematically aligned together. No less then that. Several small yet significant measures may build up any credibility by just adding different values to it.

Towards Mega Credibility : The factors that determine the magnitude and size of your credibility are several but I am mentioning only a few of them.

  1. Character : Its not only the character of your staff but also the DNA of your company policies towards various customer, after sales, brand loyalty and quality related issues that work like the foundation of your mega-credibility. Even before anyone starts using your product or services they try to investigate or know more about your organization or credibility. If more people consider you a responsible person then your success is almost assured.
  2. Quality : If your quality is ultimate and yet your pricing very modest then it would definitely better the brand credibility. Similarly if the behavior of your sales, after sales, services, marketing and supply teams is also a class in itself, then no one is going to stop you from attaining a mega credibility.   Although the overall quality of the company is very important, but its also crucial to maintain the mark.
  3. Communication :Every organization or individual willing to attain a mega-credibility, should first learn how to propagate the positive feedback and achievements in market. One must be extremely careful while highlighting any material that may affect its credibility. A slight slip or a little sub standard stuff shall invariably better your competitors only.
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    Interaction : Remember that its not communication or customer care. It doesn’t have any relations with that. Its the modus operandi how your organization or you interact with your clients, work force, suppliers, vendors and the publics. If they have 24X7 access to the concerning authorized people then only it will transform your credibility in the right direction.

  5. Transparency: If your publics are not able to see how do you do, then they will never accept you as open and honest. Any unwanted secrecy about what is well known about the process and procedures adapted by your competitors will harm you beyond repairs. Your credibility would suffer serious credibility smashing missiles. The best way to deal with such disasters is a timely self-disclosure propaganda.Credibility Package: No organization should ever try to grease or hurt, please or annoy or oppose & favor any sorts of non professional & irrelevant ideologies. Your company logo, stationary and advertising endeavors should never overlook these issues. Your work force should get such an uniform that suits every caste & creed. Such measures tell a lot about you or your organization.
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    Conclusion : Every organization or individual interested in attaining mega credibility status should exhibit pure professionalism & absolute control over personal emotions. Your products should not use any such languages or packaging as well. Try to stick to your organizational or personal goals only. Stay out of controversies. Always. If ever you or your company fall into it, reemerge ASAP. Those who are interested in mega credibility should respect the deadlines and keep delivering high-quality work without causing delays in the delivery.

    Solutions : Every organization serves some type of the specific publics and its very easy to transform the available expertise in any setup into an aura of credibility ambassadors. I may help the interested organizations in this matter, if they may spare two days time.

    (The author doesn’t own the illustrations used here)

कोकरोच का दूध भविष्य का सुपरफूड

रोच दूध

पूरी दुनिया में धूम मचानेवाली एक रिसर्च में पता चला है कि गाय, भैंस, बकरी और ऊँटनी  किसी के दूध में उतनी ताकत नहीं है जितनी कि एक ख़ास किस्म के काक्रोच के दूध में होती है I ये दूध ख़राब भी नहीं होता और बच्चों में मोटापा भी नहीं लाता I दरअसल पूरी दुनिया के वैज्ञानिक इस समय हिन्दुस्तान में इसी सप्ताह हुई एक रिसर्च के नतीजों से हैरत में हैं । मुमकिन है ये खबर आप अखबारों में भी पढ़ लें । नहीं तो ढूंढ लीजियेगा । गूगल कर लीजिएगा ।

लोबिया जैसे छोटे आकार के, प्रशांत महासागर क्षेत्र के तकरीबन सभी देशों में घर घर पाए जानेवाले कोकरोच, डिपप्लोप्तेरा पंकटाटा (Diploptera punctata), की खासियत यह है कि वह अंडे नहीं देते बल्कि पूर्ण विकसित शिशुओं को जन्म देते हैं ।  माता के गर्भ में पनप रहे सभी लारवा अपनी माता की गर्भ थैली में पैदा होनेवाले एक तरह के दूध जैसे पदार्थ पर ही जिन्दा रहते हैं ।

बच्चे पैदा करनेवाले कोकरोच के वैज्ञानिक अध्ययन के दौरान इन्डियन इंस्टिट्यूट फॉर स्टेम सेल बायोलोजी एंड रीजनरेटिव मेडिसिन के वैज्ञानिकों के एक दल ने कोकरोच के भीतर पाए जानेवाले उस दुग्ध जैसे स्राव की यह जानने के लिए जांच पड़ताल शुरु कर दी कि इंसानों और अन्य विकसित जंतुओं की तरह विकसित बच्चे पैदा करनेवाली माता कोकरोच के भीतर उत्पन्न उस दुग्ध के संघटक प्रोटीन्स की संरचना भी क्या स्तनधारियों के दूध से मिलती जुलती है । 2385527094_f4cd305090_b

इस खोजबीन में इन वैज्ञानिकों को यह चौंकानेवाला तथ्य पता चला कि मादा डिपप्लोप्तेरा पंकटाटा कोकरोच का दूध संसार के किसी भी पोषक पदार्थ से ज्यादा ताकतवर प्रोटीन है । यह प्रोटीन गौवंशीय दूध से तीन गुना अधिक कैलोरी संपन्न है और लम्बे समय तक रखे रहने पर भी कतई खराब नहीं होता । इस दूध के भीतर जितने पोषक तत्व हैं उतने किसी भी प्राणी के दूध में आज तक नहीं पाए गए हैं । इसी कारण जैव वैज्ञानिकों द्वारा यह माना जा रहा है कि यदि  सही तरह से इस प्रोटीन को प्रयोगशाला में बनाया जाए या किसी और तरीके से संग्रहीत किया जाए तो मादा कोकरोच का यह दूध भविष्य में परमाणु युद्ध के कारण विकिरण से संभावित विनाश, पर्यावरण प्रदूषण, तापमान की बढ़ोतरी और किसी भी प्रकार खाद्यान्न संकट पैदा होने पर मानव जाति को ज़िंदा रखने के काम आयेगा ।

इस शोध दल के एक सदस्य वैज्ञानिक डॉ. एस बनर्जी के अनुसार, “मादा कोकरोच के इस दूध में पर्याप्त प्रोटीन, अमीनो एसिड्स, चिकनाई और चीनी होते हैं। भविष्य में इस दूध का प्रयोगशालाओं में उत्पादन बिना किसी कोकरोच के किया जा सकेगा” ।

 इसी शोध अध्ययन के दूसरे वैज्ञानिक डॉ. सुब्रमन्यन रामास्वामी के अनुसार, “ यह दूध आसानी से ख़राब भी नहीं होता । इस पर 57 दिन चले अध्ययन में भी रेडियो एक्टिविटी का भी असर होता नहीं दिखा है” ।

 इस शोध अध्ययन पर दुनिया भर के वैज्ञानिक निगाह गडाये हुए हैं । ख़ास तौर से चीन, कोरिया, मंगोलिया, जापान तथा थाईलैंड के वैज्ञानिक इस शोध को आगे बढ़ने में लग गए हैं ।  उम्मीद की जा रही है कि जल्दी ही हिन्दुस्तानी वैज्ञानिकों की इस टीम को नोबेल पुरस्कार भी मिल सकता है ।

और जानकारी चाहें और इस खबर पर यकीन ना हो तो  इस रिसर्च से सम्बंधित यह वीडियो भी देखिये I


फ़ौजी का पिछवाड़ा

एक कश्मीरी, टीवी रिपोर्टर और हिन्दुस्तानी सेना के हवलदार अक्स अलीग को आतंकियों ने पकड़ लिया. गला रेत कर मौत की सज़ा देने से पहले आतंकियों के लीडर ने उनकी आख़िरी इच्छा पूछी गयी.
कश्मीरी ने कहा दो प्लेट गर्मागर्म कबाब खाऊंगा.
टीवी रिपोर्टर बोली जहाँ गला काटा जाना है वहां का फुटेज मैं शूट करके अपने ऑफिस ट्रान्सफर करूंगी ताकि मेरे दोस्तों को पता चले मैंने आख़िरी वक्त तक काम किया.
हवलदार अक्स अलीग बोले, सरकार मेरे पिछवाड़े पर ऐसी लात मारिये कि मैं फ़ुटबाल की तरह सामने जाकर गिरूँ.
कश्मीरी को कबाब खाने को मिल गए . बोला अब काटो गला. तैयार हूँ.
रिपोर्टर का आख़िरी टेप दिल्ली ट्रान्सफर हो गया. कटे बाल सहला कर शान से बोली अब काटो गला. तैयार हूँ.
सबसे आखिर में हवलदार अक्स अलीग के पिछवाड़े आतंकियों के लीडर ने ज़ोरदार लात मारी. वह काफी दूर जाकर औंधे मुंह गिरा. और अगले ही पल कहीं छिपाई हुई रिवाल्वर निकाल कर आतंकियों के लीडर का भेजा उड़ा डाला. बची हुई गोलियों से उसने साथ खड़े तीन और आतंकी उड़ा डाले. भगदड़ मचते ही उनकी एके 47 उठाकर बाकी आतंकियों को उड़ा डाला.
लाशों के बीच बचते बचाते बाहर जाते समय कश्मीरी और टीवी रिपोर्टर ने हिन्दुस्तानी फ़ौजी से पूछा आप आसानी से इन हरामजादों को पहले ही मार सकते थे, फिर हमारी अंतिम इच्छा पूरी होने के बाद और अपने पिछवाड़े पे लात क्यों खाई? सीधे शूट क्यों नहीं करते इन हरामखोरों को?
शायराना अंदाज़ में हवलदार अक्स अलीग ने कहा, “देते जो सज़ा यूं ही, ये कहते आप सब ही, कश्मीरियों पे ज़ुल्म ढा रहे हैं मिलिट्री वाले !”

शहंशाही गाली कला

akbar1शहंशाह अकबर के ज़माने की बात है ।

अकबर के नवरत्नों में से एक थे अब्दुल मोमिन । उनके बहुत ज्यादा प्याज खाने की वजह से शहंशाह अकबर ने उनको ‘मुल्ला दो प्याजा‘ का खिताब दे डाला था।

मुल्ला के रहन सहन और शौकों बारे में बहुत अजीब अजीब और अश्लील बातें कही जातीं थीं। कोई उनके किसी ‘ख़ास’ शौक को लेकर उनको ‘जनाना’ कहता तो कोई उनको चुगलखोर चापलूस । शहंशाह हुमायूं के वक्त हिन्दुस्तान आया, मुल्ला हिन्दुओं से बेहद नफरत करता था। अकबर के हिन्दुओं से संबंधों के कारण मुल्ला अपनी नफरत को बहुत जाहिर नहीं करता था । लेकिन मौक़ा पड़ते ही वह बीरबल को किसी ना किसी अपमानजनक परिस्थिति में फंसाने में लगा रहता था ।

बादशाह के ख़ास मनसबदारों और दरबारियों की किसी महफ़िल में एक मौके पर मुल्ला दो प्याजा द्वारा हिन्दुओं को कायर और घटिया कहे जाने पर एक राजपूत सेनापति पृथीपाल (असली नाम पृथ्वीपाल होगा) ने मुल्ला की तुलना सूअर से कर दी ।

मुल्ला भी अकबर के कम चहेते ना थे I वह शिकायत लेकर अकबर के सामने पेश हुए I Mulla-do-piazza(1)

चतुर अकबर ने इसे हिन्दू-मुस्लिम विवाद मानकर राजा मानसिंह से सलाह लेनी चाही । उन्होंने समझदारी दिखाते हुए कहा कि राजा टोडरमल को क़ानून की ज्यादा जानकारी है । राजा टोडरमल भी कन्नी काट गए। उन्होंने कहा कि राजा बीरबल से बेमिसाल राय मिलेगी । राजा बीरबल की भी मुल्ला से नहीं बनती थी। कई दरबारी तो यह सोच कर खुश थे कि अब बीरबल फंस ही गया ।

अकबर से बीरबल ने पूछा “जहाँपनाह, राय दूं, या फैसला ?”

अकबर भी समझता था कि बीरबल सार्वजनिक तौर पर नाइंसाफी तो कर ही नहीं पायेंगा । उसने कहा, आपका कहा हमारा हुक्म माना जाएगा । उस पर बेशक अमल होगा । अगर खुद हमको नामुनासिब लगा तब ही हम दखल करेंगे ।तब आपको सज़ा मिलेगी बीरबल ।

बीरबल ने मुक़दमे की कार्रवाई शुरू की । पूछा ” मुल्ला हुज़ूर फरमाइए पृथीपाल ने कितना नशा कर रखा था?”

गुस्से में भन्नाए मुल्ला ने बिना सोचे कहा, ” कम से कम दस प्याले !”

“ मुल्ला हुज़ूर को फ़ौरन से पेश्तर दस प्याले शाही अंगूरी पेश की जाए ।” बीरबल ने ऐलान किया ।

अकबर ने सहमति में सर हिलाया, मगर पूछा “ यह हुक्म क्यों बीरबल?”

बीरबल बोला, “क़ानून है खून का बदला खून । इसलिए नशे में गाली का बदला नशे में गाली दिलवा कर दिया जाएगा” ।

birbal-leadशाही अंगूरी मुल्ला के सामने पेश की गयी । बीरबल ने मुल्ला से पूछा, “ मियां हुज़ूर, आपको यकीन है कि दस प्याले के बाद आप सिर्फ पृथीपाल को ही गालियाँ देंगे ? क्योंकि आप इजलास में हैं और अगर आपने एक लफ्ज भी पृथीपाल के बजे किसी और को कह दिया तो आपको बादशाह हुज़ूर से सामने बेअदबी की बहुत कड़ी सज़ा मिलेगी ।“

दबी जुबान में मिमियाते हुए मुल्ला ने पूछा, “राजा बीरबल, मैं इनको मुआफ करता हूँ ।“

बीरबल ने मुल्ला से फिर पूछा, “ मुल्ला ये फरमाइए कि आप शाही अंगूरी के दस प्याले पीने से क्यों बाख रहे हैं ? क्या आपको ये लगता है कि मदहोशी के आलम में आप शहंशाह को औल-फौल कह सकते हैं?”

मुल्ला दो प्याज़ा ने कहा , “नशा तो नशा है !”

बीरबल ने ऐलानिया कहा, “जिल्लेसुभानी जो इंसान मदहोशी में हुज़ूर की शान में भी गुस्ताखी कर सकता है, उसे पृथीपाल ने जो कहा वो कम है क्या ?”

अकबर मुस्कुराया और बोला, सब लोग गौर फरमाएं  “राजा बीरबल ने शाही इजलास में मुंसिफ के बतौर अच्छा काम किया और ये दिखाया कि होशमंदी रखी जाए तो किसी को कानून की हदों में रह कर भी गाली दी जा सकती है ।

बाद में शहंशाह अकबर ने मुल्ला दो प्याजा को आगरा से दूर लाहौर का किलेदार (गवर्नर) बना कर भेजने का हुक्म  भी जारी कर दिया । मुल्ला  को किसी ने आगरा और फतेहपुर सीकरी में दोबारा नहीं देखा ।



Cross Functional Relations Management

Begin Well, Keep Slow : You are paid to deliver results using any type of stuff you have. Its YOUR skill how fast and how efficiently you achieve it. And managing results through cross-functional influences is like a child’s play. If you know its basics. Initially it may appear very difficult but with some practice you will be able to learn that its similar to constructing meaningful words out of useless alphabets. Like joining building blocks to make the desired shapes.

Evolving YOUR Strategy :  Watch a three year old making very simple words by picking up or sorting out the required plastic alphabets scattered nearby. What the kids usually do? During their kindergarten ages they sort out all the alphabets in a particular manner mostly assorting all similar alphabets together. In management this grouping often helps you to identify who is capable of doing what and what is their availability?  So out of a horrible pile you have to identify and select the elements that might be useful and then try organize them in a more complex manner. After some practice It becomes like solving a crossword puzzle. Another step ahead towards almost assured success.

Complex Decisions : Every manager must steer across cross functional
diversities very carefully simply by not using useless alphabets and picking up the ones that make sense. While you require to produce results you must do this modestly without hurting anyone, because they might be of some use in some other cross-functional scenario.

Handling Cross-Functionalism : If you would ever watch a toddler struggle with the apparently nonsensical building blocks to make a detailed project, just observe how the game proceeds ahead? You would notice that initially that kid try to copy the plan printed on the box or illustrated in the booklet. At any juncture when he or she comes short of blocks he try to place some other units to better the shape.  Hardly any kid leaves the game play and  approach seniors to ask for assistance. Reason being he or she enjoys leading and taking decisions.


NO Powers, Yes Empower : With the transformation of the global business scenario the role of a singular expert is out and the teamwork is in. The new way of management is shedding fruitless hierarchy to stop wasting time in getting  green signals and trusting fluid collaboration. The cross functional identities are useless if we waste time nursing their superiors’ ego. The new way is to pick up better leaders among the cross functional teams and assign them specific jobs using  empowerment. It Saves Time. Saves Effort. Betters Results. Wastes nothing. The reports and feedback also remain very useful. Vertical hierarchical structures are also replaced by network organizations, adaptive organizations, informal organizations and horizontal organizations. The company’s cross-functional teams of chosen internal leaders move quickly and adapt to any assignments in a better manner. No passing the buck. Management researchers have concluded that NOT leaders but the teams deliver better , faster. The new management strategy is using diverse teams of the sub ordinate management strata and their work force representing different areas of functions. The only thing that is kept in mind is their workable relationships, to avoid the failures due to lack of coordination and understanding. Its not essential that you take a group of friends because they like to remain together. The effective cross functional coordinators may easily select some members who might be totally strangers even. There are a number of possibilities here, you will have to consider as required.

Emerging Cross Functional Culture : The diversity of the cross functional team players gradually evolves into a new result oriented culture. Recently my daughter’s six year old son demanded some characters from his favorite animated cartoon movie Angry Birds. I tried to understand that basically he needed some similar toys. So I proposed that if you help me then I try to make the toys which are not available in India. And this way we made a micro size team. Both of us not knowing anything about making handmade toys. Yet, he meticulously advised me to initially make the toys from papers and then we graduated to card board toys. We kept on making one toy after the other and within three days we made about a dozen animated characters and toy vehicles. Thus, by creating a cross-functional team, we transform a potentially very powerful possibility into some great results. This way of functioning cuts short many time wasting formalities and weave an unimaginable cross-functional design of diverse unexplored talents.

img3Leadership Challenges: The leadership of a cross-functional team is complex and very difficult. The team leader must be capable of understanding both the subject and the contributions made by people from a wide variety of backgrounds. He must have the human resources management skills to facilitate the interactions of his team. Apart from these traits the cross functional leader must know about the assignment well. He should be capable of encouraging  participation, conflict resolution and consensus building. He must be able to work without using any  authority. Additionally if such team leader is capable of adapting faster and working in a more organized manner, then it would definitely be an added advantage.


Getting Results : The core value of this cross functional idea is exploiting the potential of the inter personal relations of any diverse group of carefully chosen people to manage a project, launch a program, control the production, redesign some obsolete system, develop and solve any sets of problems. This is like some children playing together, enjoying the company and creating something that gives them pleasure. In cross functional matrix  any success is not at all individual but a team success, all rewards become team rewards, and if at all the team fails, they start afresh to win without getting disheartened. In cross functional management a clear team goal is invariably the most important thing that is very clearly explained to everyone. The team leader remains directly responsible to gain the commitment of the team and trains them. The group creates their own policies and procedures to systematize the functioning.

Advantages : There are many advantages of effective cross-functional teams. First is the speed, all cross-functional teams work faster as I elaborated earlier because the process reduce the time it takes to get things done, especially during the product development process. Secondly the cross-functional teams improve any organization’s ability to solve complex problems. These teams help the organizations satisfying the customer’s needs. They increase the creative capacity of the organizations. These teams almost effortlessly develop new skills rapidly. The cross-functional management strategies promote more effective teamwork and saves a lot of money that can be used later in welfare activities.


Disadvantages : It sounds good in theory, but if the participating team is not properly raised or managed it may fail miserably in the field, later. There are some secondary strategies to control this situation but this management strategy is solely dependent on what sort of majority you have in your company.

(The author doesn’t claim any right over the illustrations used in this write up)

आधुनिक राजनैतिक जनसंपर्क के सिद्धांत

उत्तर प्रदेश के साथ ही कई राज्यों में विधानसभा चुनाव आ रहे हैं I तय है इस बार जंग सर्वाधिक तीखी, मसालेदार और धारदार होगी I देश के प्रसिद्ध प्रकाशन समूह राजकमल प्रकाशन दिल्ली से शीघ्र प्रकाश्य अपनी नयी पुस्तक आधुनिक राजनैतिक जनसंपर्क के एक महत्वपूर्ण अंश को मैं आपके सम्मुख प्रस्तुत कर रहा हूँ I इस अंश में बदलते युग के आधुनिक राजनीतिक जनसंपर्क पर विभिन्न माध्यमों और तकनीकों के प्रभाव के नज़रिए से कम समय में बेहतरीन नतीजे लेने के लिए  मतदाता को प्रभावित करने  के कुछ सिद्धांतों का ज़िक्र किया है I पता नहीं किसके काम आ जाए?

याद रखिये ये तौर तरीके कोई भी आजमा सकता है, मगर भारी अंतर से सुनिश्चित जीत के लिए सिर्फ यही सिद्धांत काम नहीं आयेंगे I रक्षात्मक और आक्रामक दोनों तरह की स्ट्रेटजीस भिन्न परिस्थितियों और प्रतिद्वंद्वी प्रत्याशियों के मुताबिक बनानी पड़ेगी I व्यवसायिक तौर पर यदि किसी को इस बारे में और अधिक जानकारी चाहिए तो कृपया टिप्पणी में अपना प्रश्न लिखें, या मेल करें I मैं तत्काल और निश्चित मार्गदर्शन करूंगा I

पहला सिद्धांत : विज्ञापन और जनसंपर्क में आंकड़ों की भरमार कतई फायदा नहीं देती राजनीतिक जनसंपर्क के ग्यारह सिद्धांत!  जितनी खरी, सरल और सीधी बात I उतनी असरदारI ज्यादा आंकड़ेबाज़ी और लफ्फाजी कोई पसंद भी नहीं करता I सरल तरीका ये है कि  किसी भी क्षेत्र के प्रभावित लोगों को अपनी बात कहने में इस्तेमाल कीजिये I आपकी बात में स्थानीय अनुभव शामिल हों तो और बेहतर होगा I उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश में वर्तमान सरकार ने क्या क्या काम किया है, सरकार ये बताना चाहेगी, मगर उसे किस तरह जनता तक पहुंचाया जाए, ये महारत का मामला हैI उसमें आंकड़े कतई नहीं चलेगेI दूसरी और अपने अपने शासन काल में जन हित का काम तो दूसरे दलों ने भी बखूबी किया हैI भला उन कार्यों को जनता खुद-ब-खुद कैसे याद रखेगी? आपको ही बताना पडेगा ! जिन दलों और निर्दल लोगों ने उत्तर प्रदेश में जनकल्याण का कार्य करने का अपना खाता नहीं खोला है, उनको अपनी स्ट्रेटेजी चुनाव और प्रभाव क्षेत्र के मुताबिक ज़रा नए किस्म की बनानी पड़ेगीI कहीं भी लफ्फाजी किये बिना और जनता को आंकड़ों से पकाए बिना, कम से कम समय में मुद्दे पेश करने की कला ही काम आयेगीI इन हालातों से निपटने की असरदार रणनीति बनाना ही इस सिद्धांत के अंतर्गत आता है I

दूसरा सिद्धांत : प्रभावहीन लोगों की भीड़ को साथ रखने ज़्यादा फायदेमंद चुनिन्दा असरदार और विश्वसनीय लोगों को प्रभावित करना है I  राजनीतिक जनसंपर्क के ग्यारह सिद्धांत 2हर समाज आम तौर पर एक तरह से भीड़ तंत्र की तरह बर्ताव करती है I भीड़ उसी की सुनती है जिसकी आवाज़ बुलंद हो और जिसकी बात में दम हो I यह खासियत कम ही लोगों में होती है I ऐसे लोग अफवाह भी बखूबी फैला लेते हैं I ऐसा एक शख्स अनगिनत लोगों की भरपाई करता है I ऐसे लोगों का चयन, प्रशिक्षण और मार्गदर्शन ही संसार भर में आधुनिक चुनावों के सञ्चालन की रीढ़ हैI ये लोग सार्वजनिक मंचों की जान नहीं होते मगर भीड़ों को असर में लेना उनको आता हैI कई बार तो ऐसे लोग चुने नहीं जाते, महज कुछ प्रतिभावान लोगों को क्षेत्रीय ज़रुरतों के मुताबिक अपने हिसाब से कम से कम समय में तैयार किया जाता हैI ये लोग अल्पायु, युवा, प्रौढ़ और बुजुर्ग किसी भी आयु वर्ग के हो सकते हैंI किसी भी माध्यम का प्रयोग करके आपकी बात को आसानी से फैला सकते हैंI  इन हालातों से निपटने की असरदार रणनीति बनाना ही इस सिद्धांत के अंतर्गत आता है I

तीसरा सिद्धांत : आम जनता शिक्षकों, अधिवक्ताओं और चिकित्सकों पर ज्यादा भरोसा करती है I उनको साथ लेना सदा फायदेमंद रहता है I  राजनीतिक जनसंपर्क के ग्यारह सिद्धांत 3समाज  सबसे ज्यादा जिन वर्गों की इज्ज़त करता है उनकी ही बात भी चुनावों के मौके पर ज्यादा सुनता है और उससे प्रभावित भी होता है I  इस तरीके को आजमाने से किसी भी दल को फायदा हो सकता हैI शर्त ये है कि आपके द्वारा चुना गया विशेषज्ञ अलोकप्रिय, विवादित और अयोग्य हरगिज़ नहीं होना चाहिएI  याद रखिये कि आपके प्रतिद्वंदियों द्वारा भी ऐसे लोगों की सहायता और सेवाएँ लिए जाने की पूरी पूरी संभावना है, ऐसे में आपको उन्हीं पत्तों से जीत का अचूक दांव इस तरीके से लगना पडेगा कि मुकाबलेबाज़ की बिसात ही पलट जाए I  यह भी याद रखियेगा कि चुनावी जंग ताश का खेल नहीं कि सामनेवाले के हाथों में तीनों इक्के ही होंगे I इन हालातों से निपटने की असरदार रणनीति बनाना ही इस सिद्धांत के अंतर्गत आता है I

चौथा सिद्धांत : युवा वर्ग को साथ लीजिये, वे आसानी से साथ नहीं छोड़ते I  उत्तराजनीतिक जनसंपर्क के ग्यारह सिद्धांत 4र प्रदेश के पिछले आम चुनावों में छात्र और बेरोजगार युवा वर्ग समाजवादी पार्टी को समर्थन देने के लिए पगलाए हुए थे I  समाजवादी पार्टी के घोषणा पत्र में लैपटॉप, टेबलेट और बेरोजगारी भत्ता के साथ ही बहुत सी ऐसी योजनाओं का ज़िक्र था जिनकी मुंह दर मुंह उत्तर प्रदेश के साथ  ही पूरे भारत के युवाओं में शोहरत फ़ैल गयी I सभी युवा इस बात पर आमादा थे कि समाजवादी पार्टी को वोट देंगे तो यह होगा और वह मिलेगा I अब नए चुनाव उत्तर प्रदेश की दहलीज पर हैं और युवाओं के तरह तरह के मत सोशल मीडिया पर छाये हुए हैं I इस परिस्थिति से सत्तारूढ़ दल कुछ सबक सीख कर कुछ नया काम कर सकता था, मगर युवा वर्ग की निराशा को दूर करने और बहुत से उन वायदों को पूरा करने की कोशिश नहीं हुई है, जिनकी वजह से युवा मतदाता नाराज़ है I जाहिर है कुशल रणनीतिक प्रबंधक इस परिस्थिति से लाभ लेकर हवा का रुख अपने दल में मोड़ सकता है I यहाँ बुनियादी स्ट्रेटेजी ये होगी कि जिन युवाओं को लाभ नहीं मिला (ज़ाहिर है, उनकी संख्या बहुत ही ज्यादा है) उनको किसी दूसरी दिशा में कैसे मोड़ा जा सकता है ? यह भी महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या लाभ पानेवाले युवाओं को उनके वंचित साथियों की मदद से प्रभावित करना कैसे मुमकिन होगा?  इन हालातों से निपटने की असरदार रणनीति बनाना ही इस सिद्धांत के अंतर्गत आता है I

पांचवा सिद्धांत : लगातार मदद करनेवाली सरकार के पुराने रिकार्ड को निष्फल करना बड़ी चुनौती I राजनीतिक जनसंपर्क के ग्यारह सिद्धांत 5अनेक बार सत्तारूढ़ सरकार की आसानी से वापसी हो जाती हैI  जनसंपर्क विशेषज्ञ ये मानते हैं कि आम जनता अहसान को आसानी से नहीं भूलती I ठीक उसी तरह नहीं भूलती जिस तरह जनता साम्प्रदायिक हिंसा, किसी जाति विशेष के साथ पक्षपात, गैर जिम्मेदाराना जुमलेबाजी, पार्टी के क्षत्रपों (आंचलिक नेताओं) के गैर जिम्मेदाराना आचरण और संवेदनशील मुद्दों पर विफलता को नहीं भूलती I ब्रिटेन के प्रधानमन्त्री रहे विंस्टन चर्चिल ने इस सम्बन्ध में मजेदार टिप्पणी की थी, ” लाख बार मदद कीजिये, हज़ार बार काम आइये, लोग चुनाव के समय ये याद रखते हैं कि उनके नेता किस जिम्मेदारी को नहीं निभा पाए I सज़ा उसी की मिलती है I” उल्लेखनीय है कि द्वितीय विश्वयुद्ध जीतने के बावजूद ब्रिटेन ने विस्टन चर्चिल को दुबारा प्रधानमंत्री नहीं बनाया I  सभी जानते हैं कि ब्रिटेन के दूसरे कई राजनेताओं को तमाम खामियों के बावजूद दोबारा चुने जाने का मौक़ा मिला I सो, राजनीतिक जनसंपर्क में लगातार काम करने, कामयाबी पाने और लोगों की मदद करनेवाली सरकारों के काम को भुलाना नामुमकिन नहीं I जनमत का लोहा गरम हो तो उसे किसी भी दिशा में मोड़ा जा सकता है I इन हालातों से निपटने की असरदार रणनीति बनाना ही इस सिद्धांत के अंतर्गत आता है I

छठा सिद्धांत : असंख्य मीडिया ऑपरेटर्स भी सच को व्यर्थ नहीं कर सकते !  इस सिराजनीतिक जनसंपर्क के ग्यारह सिद्धांत 6द्धांत में एक बड़ा झोल है I आम तौर पर ये माना जाता है कि सोशल मीडिया जनसंपर्क का सबसे अचूक माध्यम है I नौसिखिये प्रचार विशेषज्ञ इस बात को छाती पीट पीट कर कहना चाहेंगे कि सोशल मीडिया के माध्यम से सब कुछ मुमकिन है I कुछ समय पहले मैं मेरठ विश्विद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार के स्नातकोत्तर छात्रों को पढ़ा रहा था, तब एक लड़के ने कोई सवाल पूछने की शुरुआत कुछ यूं की, “सर, सोशल मीडिया से तो सब कुछ मुमकिन है, तब …” उस युवक की बात पूरी होने से पहले ही आगे की कतार में बैठी उसकी एक सहपाठी ने टिप्पणी कर दी , ” क्यों तू रोट्टी भी खा सके क्या फेसबुक पे?” बात हंसी में टल गयी I लेकिन इस घटना में एक सन्देश भी निहित है कि सोशल मीडिया एक सीमा तक ही मदद करता है I वह भी सच और सबूतों के साथ पेश मामलों में I सोशल मीडिया पर सर्वाधिक सक्रिय भारतीय जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी की आपसी स्पर्धा में भाजपा पहले चक्र में एक गंभीर गलती कर चुकी है I उनके कुछ बेअक्ल सोशल मीडिया ऑपरेटर्स ने फोटोशॉप का सहारा लेकर कई बार कुछ असत्य तथ्य जनता को परोसने की भूल की I नतीजा ये निकला कि समूची भाजपा की विश्वसनीयता दांव पर लग गयी I लब्बोलुबाब ये कि सोशल मीडिया पर आपका झूठ ज्यादा देर दौड़ नहीं पायेगा I देर सबेर आपकी सच्चाई का भी गर्भपात करा देगा I इन हालातों से निपटने की असरदार रणनीति बनाना ही इस सिद्धांत के अंतर्गत आता है I

सातवाँ सिद्धांत : झूठ का सफ़र ज्यादा लंबा राजनीतिक जनसंपर्क के ग्यारह सिद्धांत 7नहीं होता I झूठ कितना भी रंगीन हो, अंततः पकड़ा ही जाता है I   बुनियादी तौर पर तो यह सिद्धांत छठे सिद्धांत जैसा ही नज़र आता है, मगर उससे अधिक दूरगामी है  I वस्तुतः राजनैतिक  जनसंपर्क का वो ज़माना गया जब 1933 से 1945 तक जर्मनी के प्रचार मंत्री (30 अप्रेल को हिटलर की आत्महत्या के बाद एक दिन को जर्मनी के राष्ट्राध्यक्ष भी बने) जोसफ गोएबल्स के प्रोपेगंडा उसूलों का जादू प्रचार की दुनिया के सर पे चढ़ा हुआ था I वह दो तरह के मुहावरे बोला करते थे I पहला : एक ही झूठ को बार बार, हज़ार बार, हर बार  नए तरीके से दोहराइए और जनता उसे सच मान लेगी I  दूसरा : अगर आपको मूतना भी हो तो दुश्मन के खेमे पर मूतिये I कुछ ही दिनों में बदबू से उसकी नाक सड़ जायेगी और मनोबल ख़त्म I दूसरे विश्वयुद्ध में गोएबल्स की प्रचार तकनीक का डंका  बजता था I लेकिन आज ज़माना बदल गया है अब एक ही सच को कई  तरह से दोहराने को अच्छा माना जाता है I इस तकनीक को कई प्रचार विशेषज्ञ ‘री-इंजीनियर्ड ट्रुथ’ या ‘रिफाइंड ट्रुथ’ भी कहते हैं I इस तकनीक में क्या और कितना बताना है तथा उसमें किस बात का तड़का मिलाना है और कितना सच छिपा जाना है, ये ख़ास महत्व रखता है I आजकल अंतर्राष्ट्रीय फलक पर पाकिस्तान इस तकनीक का माहिर माना जाता है I इन हालातों से निपटने की असरदार रणनीति बनाना ही इस सिद्धांत के अंतर्गत आता है I     

आठवाँ सिद्धांत : जनसंपर्क की डिजिटल दुनिया में एक सक्रियराजनीतिक जनसंपर्क के ग्यारह सिद्धांत 8 कार्यकर्ता, हज़ारों निकम्मे विशेषज्ञों से बेहतर है I डिजिटल माध्यमों की सबसे बड़ी खूबी है कि वे रात दिन काम करते हैं और पूरे संसार की विचारधारा को प्रभावित करते हैं I आज इन माध्यमों की ये दशा हो गयी है कि नरेन्द्र मोदी, अखिलेश यादव, राहुल गांधी, कु.मायावती और अरविन्द केजरीवाल  को पता चले बिना ही उनसे समर्थक-आलोचक-विरोधी आपस में इतनी शिद्दत से जूझते रहते हैं, कि सोशल मीडिया पर मौजूद वास्तविक आम आदमी झल्ला जाता है I किसी मुद्दे पर कुछ भी प्रतिक्रया दीजिये , दूसरों को भक्त कहनेवाले लोग आपकी जुबान खींचने पर उतारू हो जायेंगे I इस जंग में फिलहाल सबसे कम सक्रिय बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस हैं I सर्वाधिक सक्रिय भाजपा और आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता तथा समर्थक हैं I  इस मामले में अनोखा पक्ष ये है कि भाजपा की सोशल मीडिया मुहीम झूठ बोलनेवालों के रूप में प्रचारित लोगों के हाथ में है I जेएनयू में भारत विरोधी नारेबाजी सम्बंधित जी-टीवी के रॉ फुटेज को अहमदाबाद के विश्वविख्यात सेन्ट्रल फोरेंसिक संस्थान ने भले ही सही बता दिया हो, लेकिन सोशल मीडिया पर मोदी विरोध के तेज़ाब के आगे कोई भी सच बहुत परिश्रम से ही टिक पायेगा I आम आदमी पार्टी के पास जो स्वयंसेवी सोशल मीडिया टीमें हैं उनमें सभ्यता, शालीनता और संयम का अभाव होने के कारण देर सबेर वे खुद ही अलोकप्रियता का शिकार हो जानेवाली हैं I  इस दिशा में बाकी पार्टियों के पास भी कोई रणनीति नहीं है I इन हालातों से निपटने की असरदार रणनीति बनाना ही इस सिद्धांत के अंतर्गत आता है I

नवां सिद्धांत : जनसमस्यायें जनता की दुखती रग और राजनीतिक हथौड़ा हैं I राजनीतिक जनसंपर्क का एक महावाक्य दरअसल एक तरह का महामंत्र भी है, ‘आप कुछ लोगों को  काफी समय तक खुश रख सकते हैं मगर बहुत से लोगों को सदा खुश नहीं रख सकते !’

epa05175344 Indian people fill up canisters and containers with water from a tanker in New Delhi, India, 22 February 2016. Delhi faces a water crisis after agitators shut a key water supply amid deadly protests about caste-based quotas for jobs and education in Indian's northern state of Haryana but according to the fresh news reports that Indian army took the control of Munak canal from members of the ethnic Jat community as the canal is the main source of water supply to Delhi, carrying 543 million gallons water per day. EPA/RAJAT GUPTA

उपरोक्त वाक्य से ही जन्मा है ये सिद्धांत I इसे मज़ाक में ‘चुगली करो I खुजली करो I उंगली करोI बस में करो I’ भी कहा जाता है I चुगली करो, संकेत दरअसल जनता की किसी ना किसी समस्या को पहचान कर उसे याद दिलाना है, कि आपने अमुक पर भरोसा किया था, नतीजा क्या हुआ? सभी जानते हैं कि शरीर के उन भागों तक जहाँ आपका हाथ नहीं पहुँच पाता यदि कोई उसी जगह किसी तरह खुजा भर दे तो वह व्यक्ति उस जगह को खुजाने में व्यस्त हो जाता है I कई ठग खुजली के पाउडर से ये कारनामा किया करते हैं I जनता के बीच ऐसे मुद्दे उठा देना जिनकी याद आने पर लोग बेचैन हो कर सब मुद्दे भूल जाएँ, इसी तरह की तकनीक है I इस तकनीक में समाधान तो पेश नहीं किया जाता और ना ऐसा कोई इरादा जताया जाता है, परन्तु जिस तरह इशारों में ही भूली बिसरी किसी विकराल समस्या को आहिस्ता से छेद दिया जाता है, वैसे ही उसके बारे में उन सभी तरह के समाधान की चर्चा की जाती है, जो किसी दुसरे को सत्ता मिलने से मुमकिन हैं I  इन हालातों से निपटने की असरदार रणनीति बनाना ही इस सिद्धांत के अंतर्गत आता है I

दसवां सिद्धांत : किसी एक वोटर से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं नन्हें बच्चे I नन्हेंराजनीतिक जनसंपर्क के ग्यारह सिद्धांत 10 बच्चों की हिमायत आपको समर्थकों के एक पूरे परिवार के ज्यादा करीब ले जाती है I एक एक वोटर को साधना बहुत ही मुश्किल हैI हर जगह के वोटरों के अपने मुद्दे होते हैंI मसले होते हैंI मिजाज़ होते हैं I  लेकिन  जनसंपर्क के उस्तादों की राय में जन समस्याओं को हल करने से ज़्यादा आसान है, स्कूली बच्चों की दिक्कतों पर ध्यान देना और उसका समाधान निकालने का प्रयास करना I स्कूली बच्चे बहुत संवेदनशील होने के साथ ही ज़रा से हित साधन से ही प्रसन्न भी हो जाते हैं I इसी नज़रिए से बच्चों को सबसे वफादार उपभोक्ता और प्रचारक मान कर दुनिया भर की विज्ञापन और प्रचार कम्पनियां अपने कैम्पेन प्लान करती हैं I चुनावी प्रचार में बच्चों को तरह तरह की उपयोगी सौगातें जैसे पेंसिलें, रबर, पैमाने और बिल्ले वगैरह इसी लिए बांटे जाते हैं I इन हालातों से निपटने की असरदार रणनीति बनाना ही इस सिद्धांत के अंतर्गत आता है I

ग्यारहवां सिद्धांत : बेकाबू दंगाइयों और मुजरिमों को कोई भी समाज पसंद नहीं करता I राजनीतिक जनसंपर्क के ग्यारह सिद्धांत 11 वे हर तरह से जीत की संभावनाओं की दीमक हैं I कई राज्यों में एक बार एक सरकार और अगली बार कोई और दूसरी सरकार सत्तारूढ़ होती रहती है I उन प्रान्तों के मतदाता तक मानते हैं कि जिन कारणों से वे कभी एक सरकार को सत्ता से हटाते हैं, पांच साल बाद उस सरकार को किसी ऐसे कारण से हटाना पड़ता है , जिसका  सम्बन्ध उनकी मानसिक-सामजिक शान्ति से होता है I  ये सब इसलिए होता है जब सरकारी प्रचार तन्त्र छिटपुट साम्प्रदायिक या आपराधिक घटनाओं की वजह से सरकारों को बदनाम होने से बचा नहीं पाता I पिछले दिनों फ़्रांस में नरसंहार हुआ और अभी हाल ही में अमरीका के इतिहास का सबसे बड़ा नरसंहार हुआ I इन्टरनेट और सोशल माध्यमों पर इन घटनाओं को लेकर भावनाओं का उबाल चरम पर है I इन हालातों का फायदा उठा कर, अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में प्रचार में पिछड़े डोनाल्ड ट्रम्प  अचानक ही बढ़त में आ गए I जाहिर है चुनाव आते ही इसी तरह के मुद्दों का फायदा लेने की कोशिश की जायेगी I इन हालातों से निपटने की असरदार रणनीति बनाना ही इस सिद्धांत के अंतर्गत आता है I

(विस्तृत विवरण और इन सिद्धांतों को इस्तेमाल करने की तकनीक को पढने के लिए सितम्बर 2016 की प्रतीक्षा कीजिये I राजकमल प्रकाशन, दिल्ली से मेरी यह सचित्र पुस्तक सर्वप्रथम लाइब्रेरी संस्करण के रूप में आयेगी I  फिलहाल पेपरबैक प्रकाशन नहीं किया जाएगा I )

बांस की शान में : (कविता)


डंडा, लाठी और बाँस आज तुम कहाते हो
अबे ओ बांस, फिर भी बेवजह इतराते हो
खपच्ची रूप तुम्हारा पतंग को प्यारा है
सूप बनकर के कभी कृष्ण को भी तारा है
शिव धनुष की वो अद्भुत कमान तुम्ही थे  bansuri1455437897_big
राम के बाणों की असली उड़ान तुम्ही थे
कभी बलदाऊ ने मुगदर तुम्हें बनाया था
कृष्ण की बांसुरी की मधुर तान तुम्ही थे
बांस से ही तो शब्द ‘वंश’ चलन पाया था
बंसीधर कृष्ण के उस नाम में भी तुम्ही थे
 डलिया बनकर के शिवाजी के काम आये थे
Celebration-14909 Barsanaeतुम्हारे बल पे कभी झंडे सब फहराए थे
बुंदेलों-हरबोलों की वो आन बान तुमसे थी
और मथुरा में लठामार होली तुमसे थी
गरीब गुरबा के छप्पर की शान तुम्ही हो
सुहागनों के मंडपों की जान तुम ही हो
लेखनी बनके तुम्ही ने सृजन कराया है
और पिस-पिसके तुमने पुस्तकों को जाया है
शक्तिवर्धक दवाओं में काम आते हो
अर्थी में लग के अंत साथ में ही जाते हो
ज़रा सोचो तुम्हारी गत क्या बन गयी यारों
कभी सीढ़ी हुआ करते थे, याद है प्यारों ?
                                                                                       झाडू के तिनकों ने सत्ता में दम दिखलाया है
लाठी का युग भी असल में अभी-ही आया है
बांस भैया, ये नया युग है खुद को कुछ बदलो
दिन सुधर जायेंगे सत्ता में कहीं तो घुस लो
-अक्स अलीग
मजदूर दिवस, 2016

Rock Paintings: Fusion of Nature & Arts

You’ll be surprised to know that the items displayed here all are made up exclusively of the small, shiny, tiny assortment of rocky stones found around various types of rivers anywhere. The people around the world keep buying such art ware and proudly display these elegant rock art pieces inside their drawing rooms, bed rooms, lawns, gardens and office chambers.

1612945 rock-art-mandala-stones-elspeth-mclean-canada-thumb640This rock art business is flourishing all over the world but the 200 celebrity artists who are considered to be the leaders of this rocky art business mainly belong to the US, Europe, Australia, Japan, China and Korea, with some exceptions in other countries. On an average a rock artist earns something from $150 to $600 a day. And that is the minimum modest approximation.

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मौजूदा हालात पर नवगीत :

आज़ादी का तिलिस्म, कुछ तो है उसके पास
घोड़ा है सियासत का वो, प्यारी है उसे घास
हिन्दोस्ताँ की हिफाजत, अब है नहीं आसाँ
इल्मी इदारे कहते हैं, अफ़जल है उनके पास
नसबंदी, इमरजैंसी और घोटालों के मुजरिम
मजमे लगा के कहते, हो हिन्दोस्तां का नास
खतरे में नज़र आता है, इस मुल्क का वजूद
खुद रहबरों ने सौंप दी, है रहजनों को रास
दिखता नहीं किसी को, आया ये कैसे माल
बदहाल बेचारे थे कल, अब क्या नहीं है पास
भस्मासुरों को पाल कर, फिर सत्ता की उम्मीद
सिस्टम को फेल करते, जो अब तक हुए ना पास
-‘अक्स’ अलीग

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कामेडी सीरियल ‘मे आई कम इन मैडम’

दफ्तर में काम करने के दौरान किसी मातहत को मालकिन ज्यादा लिफ्ट देने लगे तो बहुत झंझट पैदा हो जाते मालकिन के दिमाग में कुछ हो ना हो, लेकिन मातहत को गलतफहमी ज़रूर हो जाती है.  ये गलतफहमी क्या गुल खिलाती है और क्या नहीं कराती इसके जवाब ले कर आ रहा है एक नया कामेडी सीरियल.

LIFEOK टीवी पर इस मजेदार कामेडी सीरियल ‘मे आई कम इन मैडम’ का प्रसारण कल सात मार्च रात 9:30 से यानि  सोमवार से शुक्रवार लगातार किया जाएगा. मुम्बई स्थित मेरे मित्रों ने बताया कि फिलहाल कुछ कड़ियों तक उत्तर प्रदेश के थियेटर आर्टिस्ट संदीप यादव को लेने का कोई निर्णय नहीं हो पाया है. बाद में होगा या नहीं अभी कहा नहीं जा सकता. इस सीरियल के कुछ दृश्यों के चित्र मैंने ख़ास तौर से हासिल किये हैं. आपके मनोरंजन के लिए प्रस्तुत हैं.

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